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आज की पत्नी     मेरे पतिदेव भाई के लिए इंजीनियर लड़की का रिश्ता लेकर आए थे। घर में हर्ष का माहौल था। वह लड़की के बारे में मेरी माँ से बताते हुए कुछ ऐसे खो गए कि अपनी ही फिसलती वाणी का अंदाजा ना रहा। जिसके कारण अपनी मुसीबत बढा बैठे।        “इंजीनियर लड़की है। इसी जगह रिश्ते की हामी भर दीजिये। घर में दो तनख्वाह आए तो अच्छा है। वरना बीए-टीए पल्ले पड़़ जाएगी।”     “कहना क्या चाहते हो? बीए-एमए की डिग्री को कम आँकते हो?…

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थाली के बैंगन    शीर्षक देखकर आप जरूर चौंक गए होंगे। यहाँ किसी रेसिपी की नहीं बल्कि एक अलग किस्म के पति की चर्चा हो रही है। वैसे तो पतियों के भी कई प्रकार होते हैं। कुछ रौबदार तो कुछ भावुक से होते हैं। ज्यादातर पति समय-समय पर अपने गुणों में बदलाव लाने की क्षमता रखते हैं और सफल वैवाहिक जीवन का आनंद उठाते हैं। आज की कहानी के नायक वो हैं, जो सुविधाअनुसार कभी इधर तो कभी उधर पलटी मारते रहते हैं। अपनी पोल-पट्टी खुल जाने के डर से…

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बबलू का फ़ोन       “भाभी बबलू का फ़ोन आया है!” “अभी आई” मैं भाग कर फ़ोन तक पहुँची। अरे! प्यासा ही कुंए के पास जाता है। कुंआ तो चलकर आयेगा नहीं। यहाँ कुंआ यानि एक काले रंग का उपकरण जो लोगों के संचार का माध्यम था जो अमूमन उन दिनों घर में शान का प्रतीक था। हर घर में एक ही होता था। घर के बड़े-बुजुर्गो की तरह ही लीविंग रुम में स्थापित रहता था। उसे भी कुछ वैसा ही सम्मान भी प्राप्त था। वो लंबी घंटी….टुर्र वाली…

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हिंदी दिवस पर विशेष:                                    मेरा प्यार   “सुनो पढ़ना इसे! पन्ने पढ़कर गंदे हों  धूल से नहीं।” हाथों में मोटा सा उपन्यास थमाते हुये आदित्य ने जब ये कहा तो मेरे होश फ़ाख्ता हो गये थे।   “हाँ”   बस इतना ही कह पाई थी। किताब वजनी थी, उठाने में भी और पढने में भी। कहाँ मेरे जैसी शरारती लड़की व कहाँ वह धीर- गंभीर पुरुष। हमारा कोई मैच ही नहीं था पर…

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तृप्ति         “आज कैसी तबीयत है मि. सहाय?” “एक कैंसर का मरीज कैसा हो सकता है?” “आप ठीक हो जाएँगे।” “यही विश्वास तो कोई नहीं दिलाता तुम्हारे सिवा! थोड़ी देर और ठहर सकती हो? स्नेह के चंद बोल सुन कर जी उठता हूँ।” “आप क्या कह रहे हैं मि.सहाय? भरा-पूरा परिवार है आपका! इस विषय में आप उनसे बात करें मुझसे नहीं!” “मुझसे किसी को कोई दरकार नहीं! सब मेरे मरने की राह देख रहे हैं। तुम्हारे सानिध्य के बदले मैं पैसों की बरसात कर सकता हूँ!”…

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“माहिरा अप्पी आपसे मिलने कोई आया है।” “अभी-अभी तो बच्ची ने घर में कदम रखा है। कौन आ गया सुबह-सुबह?” अम्मी ने पूछा। “हमसे भी ज्यादा जिन्हें इनका इंतज़ार रहता है…!”मुझे हँसी आ गई थी। “अच्छा-अच्छा! मीर साहब आए हैं। जा बेटी मिल कर आजा!” “अभी जाती हूँ।” कहकर अप्पी नहाने चलीं गईं। मुम्बई से बनारस पहुँची माहिरा अप्पी इस बार बड़े दिनों बाद आईं थीं। नहा कर निकलीं तो हम सभी छोटे भाई-बहनों ने घेर लिया। हमारा बड़ा परिवार होने से एक-दो तो थे नहीं, और सबको अपनी बातें बतानी थीं।…

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  तुम महज़ नाम नहीं,जीवन हो, बेवजह भी हो और जरूरी भी। पल -पल में शामिल हो ऐसे, पास भी तुम,तुम्हीं से दूरी भी। अर्ज है कि मर्ज़ बन चुके हो ऐसे, फ़र्ज़ भी कर्ज़ लगे,और गैर जरूरी भी। कुछ इस कदर समाए हो मुझमें, तुम्हें ढ़ोना मेरा शौक भी है और मजबूरी भी! आर्या झा

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  साजन तुम बिना कैसा सावन , वर्षा ऋतु की प्रथम फुहार ज्यूँ मधुर प्रेम का प्रथम समर्पण , भिंगो गयी हैं यूँ अंतर्मन , लौट आयी है देखो तरुणाई, तेरे भी हैं चंचल चितवन ! धूली सी धरती धुले वृक्ष भी, महकाते हैं वन-उपवन , सावन देखो झूम रहा है, क्या -कुछ मन में गुन रहा है , कोई न रहे अछूता शायद , ऐसे बादल झूम रहा है । तुम भी बादल बनकर आओ, मधुर -प्रेम मुझ पर बरसाओ, धरा के समान मेरे मन को, सोंधी खुशबू से…

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  अख़बार खोलते ही जिस समाचार पर नजर पड़ी उसने घोर सदमे में डाल दिया। मेरी स्टूडेंट अवन्ती अब इस दुनिया में नहीं रही। रह – रह कर उसका चेहरा आंखों के आगे नाच रहा था। मैंने उसे दसवीं में हिंदी पढ़ाया था। उसके अक्षरों से ही समझ में आता था कि वह बेहद कल्पनाशील थी। तीक्ष्ण दिमाग और लिखने की गति में असहयोग होने से अक्षर अच्छे ना बनते थे उसके। मैं अक्सर स्टाफ रूम में बुलाकर उससे कुछ लिखवाया करती। उसने कभी भी बहाना नहीं किया। जहां और…

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  “आंटी आप? कोई काम था क्या?” मकान मालकिन ने जब सुबह-सुबह अपनी शक्ल दिखाई तो मैं चौंक पड़ी। हमारा मिलना बस किराया देते समय होता। वह भी बस पैसे रख हमें दरवाजे से ही लौटा देतीं। ऐसा व्यक्ति अगर जहमत उठा कर दरवाजे तक आ गया तो अवश्य ही कोई वजह होगी। “कुछ खास नहीं! बस टीना की बाॅल लौटाने आई थी। लो रख लो, टीना की इसी बाॅल से नवीन की कार का शीशा टूट गया है।” हाथों में एक मैली-कुचैली रबड़ की गेंद दिखाते हुए बोलीं। “दिखाईये…

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