मुझमें ही बसा करते हो…

तुम , जो मेरे अंदर बसा करते हो

जाने क्या क्या खेल रचा करते हो

कभी फूल तो कभी इत्र बनकर

मेरी हर सांस में महकते हो..

तुम, जो मेरे अंदर बसा करते हो…

गर्मियों की चाँद रात हो,

या जाड़े की नर्म सुबह..

सावन की रिमझिम फुहार हो,

या पतझड़ के रंगों सी धरा..

हर मौसम में एक नया सा रंग भरते हो

तुम, जो मुझमें ही बसा करते हो…

जीवन का ताना बाना बुनकर

जीना सिखलाते हो,

राधा से कृष्ण के प्रेम की,

पराकाष्ठा समझाते हो,

कभी रूठ जाऊं तो झूठा गुस्सा दिखाकर

अतरंगे से अंदाज़ में मुझे मनाते हो,

सच्ची झूठी दुनिया का हर रंग दिखाते हो,

तुम, जो मुझमें ही बसा करते हो..

चलते चलते अक्सर थक कर, बैठ जाती हूँ

धीरे से मेरा हाथ थाम, आगे बढ़ाते हो,

वक़्त के आगे जब, खुद से हारी लगती हूँ,

बीते पलों को याद करा, हौसला दिलाते हो,

सफर पर निकले हैं, मंज़िल भी पा लेंगे संग

अपनी इन बातों से, हर दिन नई लौ जलाते हो,

तुम जो मुझमें ही बसा करते हो,

अक्सर, मुझे बड़ा सताते हो..

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