मुझमें ही बसा करते हो…

तुम , जो मेरे अंदर बसा करते हो जाने क्या क्या खेल रचा करते हो कभी फूल तो कभी इत्र बनकर मेरी हर सांस में महकते हो.. तुम, जो मेरे अंदर बसा करते हो… गर्मियों की चाँद रात हो, या जाड़े की नर्म सुबह.. सावन की रिमझिम फुहार हो, या पतझड़ के रंगों सी धरा.. हर मौसम में एक नया सा रंग भरते हो तुम, जो मुझमें ही बसा करते हो… जीवन का ताना बाना बुनकर जीना सिखलाते हो, राधा से कृष्ण के प्रेम की, पराकाष्ठा समझाते हो, कभी रूठ…

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