हे! भगवान फिर से मेहमान

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  • अरे सुधा, सुमित ने बेडरूम से ही आवाज लगाई.जी अभी आई, कहते हुए सुधा हाथ पोंछते हुए किचन से बाहर आई. क्या हुआ सुमित ? किससे बात कर रहे थे फोन पर ?

अरे वो मालती बुआ है न,रतलाम वाली, वो आ रही है कल.अपने बेटे और बहू के साथ.मालती बुआ?अब ये मालती बुआ कौन है सुमित ? सुधा ने सोचते हुए पूछा. तुम्हारी तो दो ही बुआ है माला और पुष्पा.अरे हाँ सुधा, सुमित ने टाई बाँधते हुए कहा.वो जो भोपाल वाली ताई जी हैं न.उनके दूर की बहन है.उनके बेटे को वीजा का कुछ काम है यहाँ.. इसलिए वो लोग आ रहे हैं कल.लेकिन सुमित,सुधा ने रुआंसे स्वर में कहा.हमारी शादी को चौदह साल हो गए,मैं तो कभी नहीं मिली इनसे.अरे सुधा, तो कल मिल लेना ..कहते हुए सुमित आफिस के लिए निकल गया.

सुधा वहीं धम्म से पलंग पर बैठ गई. हे भगवान, फिर से मेहमान.अभी पिछले महीने ही तो रायपुर वाले मौसा जी का परिवार आया था.उनको महालक्ष्मी मंदिर के दर्शन करने थे और उसके पहले उसकी खुद की ममेरी बहन आ गई थी.परिवार सहित मुंबई दर्शन के लिए.ये तो अब हर महीने की बात हो गई थी.जब से मुंबई शिफ्ट हुए है, लगभग हर महीने ही कोई न कोई चला आता है.कभी कोई काम कभी मुंबई दर्शन. बहाना चाहे जो भी हो बैंड तो उसकी बज जाती है.

अब दो कमरों का तो घर है.एक उनका कमरा जहाँ पलंग रखने के बाद केवल एक आदमी के खडे होने की जगह बचती है और एक बच्चों और अम्माजी का कमरा. हाल कम डाइनिंग रूम है और किचन तो माचिस के डब्बे जितना छोटा.मुंबई में तो ऐसे ही घर होते है और उसपर ये मेहमान. पूरे महीने का बजट गडबडा जाता है.कितनी खुश थी वो जब यहाँ शिफ्ट हुए थे.सोचा था महानगर में बच्चों की अच्छी परवरिश होगी पर अब लगता है उसका छोटा शहर ही भला था.कम से कम सुकून तो था वहाँ.यहां तो घर कम होटल बन गया है.

“अतिथि देवो भवः”सुधा ने बडबडाते हुए कहा. क्या देवता ऐसे होते हैं.उसे याद आया जब मौसाजी का परिवार आया था, मौसाजी को चीनी कम तो मौसी जी को चीनी ज्यादा और उनकी बहू को ब्लैक टी विथ लेमन.किसी को पनीर खाना है किसी को पनीर से सख्त नफरत.पर मजाल कि कोई आ जाए किचन में उसकी मदद करने और उनके नाती पोते.इंसान नही राक्षस का रूप थे.उसका प्यारा फ्लावर वाज़ और वाल क्लाक दोनो ही उनके फुटबॉल की एक किक मेंं शहीद हो गए थे और जब वो महालक्ष्मी दर्शन के लिए जा रहे थे,मौसीजी ने कहा,” देखो बहू हम कुछ खा के नहीं जाएँगे.”

उसने सोचा चलो बच गई.

मौसी ने आगे कहा,” तो तुम ऐसा करना कि चालीस पचास पूड़ी जो है वो तुम पैक कर देना, बढिया सब्जी के साथ.हम दर्शन के बाद खा लेगें. वो क्या है न हमसे बाहर का कुछ खाया नहीं जाता.

“हे भगवान सुधा की आँखों के सामने पूरा ब्रह्माण्ड घूम गया.मेड ने अलग वार्निंग दे रखी है” दीदी पाँच लोगो की बात हुई थी..यहां जब देखो दस बरह लोगों से कम लोग नहीं होते..ऐसे ही चलता रहा तो मैं क्या कोई भी भी काम नहीं करेगा तुम्हारे घर.”..और जाते समय महंगे गिफ्ट दो..वो भी आन डिमांड.. और घर का जो हाल होता है उनके जाने के बाद कि पूछो मत ..ठीक करते करते पूरा महीना निकल जाता है..और तब तक फिर कोई मेहमान आ धमकता है ..बोरियाँ बिस्तर लेकर एक दजर्न केले के साथ..एक दर्जन केले बस यही तो लाते है सब उनके लिये.

“एक दर्जन केलों की कीमत तुम क्या जानो सुमित बाबू” बडबडाते हुए सुधा ने जूड़ा बनाया और भीड़ गई अगली जंग की तैयारी में.अब आज के ज़माने में मेहमानों को हैंडल करना किसी जंग से कम तो नहीं.

तो अगर आप भी है मेहमानों से परेशान तो अपने अनुभव कमेंट करके जरूर बतायें(क्योंकि गम कहने से कम होता है.

मंजुला दूसी

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