सौतेले पिता

सुनने के लिए तुम्हारे कान तरसे है,और आज भी देखो मैं तुम्हे कह नहीं रहा इस ख़त में लिख के दे रहा हूँ, ना ना ये नहीं सोचना कि सारी उम्र जिस घमंड की वजह से तुम्हे अपनी बेटी स्वीकर करने से बचता रहा, उसी घमंड की वजह से आज लिख के तुम्हे अपने मन की बात कह रहा हूँ.वो घमंड तो बरसों पहले चला गया ये तो शर्मिंदगी है मेरी,तुमसे नज़रें मिला कर अपने दिल की बात नहीं कह पाऊँगा इसलिये लिख रहा हूँ.

जब शुभ और शुभांग की माँ उनके पैदा होते ही चल बसी और उनकी देखभाल करना मेरे और अम्मा के लिए असंभव सा हो गया तो अम्मा ने तुम्हारी माँ से मेरा ब्याह कर दिया ,तुम्हारी माँ की बस एक ही शर्त थी,कि मुझे उसके साथ तुम्हे भी अपनाना होगा.मैं बेटों के पिता होने के दंभ में चूर था,लेकिन और कोई चारा भी नहीं था.आखिर अपनी माँ की ऊँगली पकडे तुम इस घर में आ गई. तुमने और तुम्हारी माँ नें दिल से हमें अपना लिया ,लेकिन हम कभी तुम्हे अपना नहीं पाए.

तुम पिता के प्यार के लिए तरस रही थी और मैं तुम्हे उसी से वंचित करता रहा. मुझे याद है ऑफिस से आकर जब मैं शुभ और शुभांग के साथ खेलता, और जब तुम हमारे पास आती तो मैं तुम्हें दुत्कार देता, उनके लिए अक्सर महंगे से महंगे खिलौने लाता और तुम मेरे लाए उस एक गुब्बारे को पाकर ही खुश हो जाती.उनका एडमीशन मैंने शहर के सबसे अच्छे स्कूल में कराया,और तुम्हे पास के हिंदी मीडियम स्कूल में डाल दिया.

मेरे इतने बुरे बर्ताव के बावजूद मैंने हमेशा तुम्हारी नजरों में अपने लिए वो सम्मान देखा,जो मैं कभी अपने बेटों की नज़रों में नहीं देख पाया.लेकिन फिर भी मेरे लिए तुम एक अनचाही मुसीबत ही थी,तुम इतने छोटे स्कूल में पढ़कर भी पढाई, खेलकूद हर चीज में अव्वल थी और मेरे बेटे आवारा और नकारा साबित हो रहे थे.तुम अपनी हर उपलब्धि का श्रेय अपने माता पिता को देती थी,जिसमें पिता यानी मेरा तो कोई योगदान ही नहीं था. बल्कि मैं तो चाहता ही नहीं था कि तुम आगे बढ़ो.

तुम्हारी माँ मेरे इस बर्ताव को खूब समझती थी,और दबी जबान में विरोध भी करती थी लेकिन मैंने उसके मन में ये बात अच्छे से भर दी थी कि,उससे ब्याह करके मैंने उसपर अहसास किया है,जबकी सच तो ये है कि अगर वो न होती तो हमारी जिंदगी कैसी होती इसकी तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता.अक्सर लोग सौतेली माँ बुरी होती है ये कहते है,लेकिन आज मैं कहता हूँ कि मेरे बच्चों को इससे अच्छी माँ तो कोई हो ही नहीं सकती,हाँ अगर किसी को बुरे सौतेले पिता देखने हैं,तो वो आकर मुझे देख सकते हैं.

मेरी देखा देखी शुभ और शुभांग भी तुमसे बुरा बर्ताव करने लगे,जबकी तुम तो उनसे कितना प्यार करती थी.उनके जाने के बाद उनका कमरा सहेजती,उनका होमवर्क करती तुम उनके आने के बाद उनकी चीजों को हाथ लगाने के लिए डाँट खाती.अब तुम तीनों बड़े हो रहे थे,तुम अपनी मेहनत से स्कालरशिप पाती नित नई बुलंदियों को छू रही थी,और मेरे बेटे जैसे तैसे पास होकर आगे बढ़ रहे थे.

तुम्हारी नौकरी शहर की सबसे अच्छी कंपनी में लग गई थी,और तुमने खुशी खुशी आकर मेरे पाँव छुए तो हर बार की तरह ही मैंने तुम्हे आशीर्वाद देना तक जरूरी नहीं समझा.अब तुम्हारी माँ को तुम्हारी शादी की चिंता होने लगी.मैंने तो हाथ खड़े कर लिए और कह दिया,”खुद कमाती है,खुद ही अपनी शादी भी करे, मैं खर्चा नहीं करने वाला” तो तुमने अपने साथ काम करने वाले अंशुल से शादी करने की इच्छा जताई.मैंने भी सोचा चलो पीछा छूटा,मंदिर में सादे तरीके से तुम्हारी शादी हो गई और वो कहते है ना अच्छे लोगों के साथ अच्छा ही होता है.अंशुल जी इतने अच्छे है कि तुम्हारे दामन में सारे जहान की खुशियाँ डाल दी.

उस रात जब अचानक मेरे पेट में जोरों का दर्द उठा, तुम्हारे नालायक भाई तो अपनी दुनिया में व्यस्त थे.तुम्हारी माँ जैसे तैसे मुझे अस्पताल ले गई, तुम भी खबर सुनते ही दौड़ी चली आई.मेरी दोनों किडनी खराब हो गई थी,अगर उन्हे तुरंत ना बदला जाता तो मेरी जान जा सकती थी.

तुम्हारे भाइयों से पूछने पर उन्होंने साफ मना कर दिया ये कहकर की हम पूरी जिंदगी एक किडनी के साथ कैसे रहेंगे.लेकिन तुमने बिना एक पल गवाएं कहा, “आप मेरी किडनी ले लीजिए,बस मेरे पापा को बचा लीजिए”.

बस तभी मुझे लगा मेरे अंदर कुछ टूट रहा है,मेरा दंभ,मेरा अहंकार ,सब खत्म हो गया.मैं तुम्हारे आगे खुद को बहुत छोटा महसूस करने लगा.संयोग भी देखो तुम्हारी किडनी मैच भी हो गई.इतना कुछ होने के बाद भी तुमने मेरी इतनी सेवा की.

तुम्हारे दोनों भाइयों ने जैसे तैसे नौकरी पा ली और अपनी पसंद की लडकियों से शादी कर ली.अब आए दिन दोनों में झगडे होने लगे,तुम्हारी माँ और मैं अब बोझ बन गए थे उनपर.जब तुम्हे ये बात पता चली तो तुम तुरंत चली आई ये कहते हुए का आप लोग अब मेरे साथ रहेंगे.मैं किस मुँँह से तुम्हारे घर आता,लेकिन तुमने एक ना सुनी,जबरदस्ती अपने साथ ले आई.

तुमने जीवन के इन आखिरी पलों में मेरी इतनी सेवा की है,जिसका उपकार मैंं अपने किसी जीवन मे नहीं उतार सकता,हो सके तो मुझे माफ कर देना बेटी,और मेरी आखिरी इच्छा है कि मेरा अंतिम संस्कार तुम करो.शायद मेरी आत्मा को तभी मुक्ति मिलेगी,भगवान से बस यही प्रार्थना है कि अगर कोई अगला जन्म हो तो वो तुम्हारी संतान के रूप में हो.

सदा खुश रहना मेरी बच्ची,भगवान तुम्हे दुनिया की सारी खुशी दे।

तुम्हारा पिता

मंजुला

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