ससुराल वो भी गांव मे

दो साल के लम्बे वक्त के बाद कालेज की सहेलियों का ग्रुप आज फुर्सत में मिल रहा था| करने को बातें हजारों थी मगर हजार बातों में भी बीना बड़े गौर से निक्की को ऊपर से नीचे देखती कभी उसकी आंखों में झांकती कभी उसकी बातों की डोर को लपक कर सीधी करने की नाकाम कोशिश करती| 

बहुत हैरान थे सब जब पता चला था कि निक्की की होने वाली ससुराल गांव में है | उन अक्खड़ स्वभाव और देशी मिजाज बारातियों में एक भी लड़की ना आयी देख सब को अंदाजा होने लगा था कि उनकी बिंदास सहेली जो कभी गांव में रही नहीं उसके लिये गांव की ससुराल में रहना कितना घुटन भरा होगा| पीठ पीछे कितनी ही सहेलियों ने निक्की पे तरस खा कर उसका मजाक भी खूब बनाया था क्यूंकि पूरे ग्रुप में एक निक्की की किस्मत ही ऐसी थी जो पढी लिखी और सबसे ज्यादा आधुनिक होने के बाद भी गांव में ब्याह कर गयी थी वो भी इकलौती बहू के रूप में| पति की सरकारी नौकरी थी बस यही अच्छी बात हुई थी| आज सब सहेलियां निक्की की आंखों में वही घुटन देखने की कोशिश कर रही थी| सब अपने अपने ससुराल के दुख बयां करने में व्यस्त थे मगर निक्की बस मुस्कराकर सबकी बातें सुन रही थी|

 

“तू अभी भी गांव में रह रही है क्या निक्की?” बीना ने निक्की की ओर बातचीत का रुख मोड़ते हुये कहा|

“क्या अभी भी? मैं तो ज्यादातर वहीं रहती हूं| मेरा गांव है ही कितनी दूर| पतिदेव की पोस्टिंग पास ही के शहर में है इसलिये हर शनिवार को गांव चले जाते हैं सोमवार सुबह वापस| मां बाबू जी गांव में अपनी खेतीबाड़ी की वजह से हमारे साथ ज्यादा नहीं रह पाते”|

“और तू ये बता निक्की तेरी सास ने तुझसे गोबर डलवाना शुरू किया कि नहीं” एक सहेली ने मजाक करते हुये पूछा, “और हां वो… उपले बनाना सीखा तूने?” दूूूूसरी सहेली ने दिमाग पे जोोर डालते हुए कहा तो सब ठहाके मारकर हंस पड़े| निक्की जानती थी अपनी सहेलियों को| सबकी ससुराल शहर में , पति की जॉब महानगरों में थी लेकिन सब अपने सास ससुर के कंट्रोल से चिढ़ी रहती थी और फिर गांव की ससुराल तो नीम चढ़े करेले जैसी मानी जाती है इसलिये निक्की को उन पर बिल्कुल गुस्सा नहीं आया|  “मेरे यहां बहुयें गोबर नहीं डालतीं” निक्की ने मुस्कराते हुये जवाब दिया|

“ओये होये हम तो भूल ही गये, इनके हुस्न का दीदार इतना आसान कहां जनाब ये तो चिलमन की ओट में छिपा चांद है जिसे गांव के महिला संगीत में ढोलक पे नचवाया जाता होगा” सहेलियां निक्की के साथ मसखरी कर रहीं थी|

“हां पर्दा तो करना पड़ता है” निक्की ने कंधे उचकाते हुये बेपरवाही से जवाब दिया|

“देख निक्की तू बुरा मत मानना लेकिन कभी कभी हमें सच में लगता है कि तूने इस शादी के लिये हांमी भर के अपने पैर पे कुल्हाड़ी मारी है सिर्फ पति की सरकारी नौकरी के लालच में तू अनपढ़ गंवारों के बीच फंस गयी, एक तो ससुराल वो भी गांव की! अब इकलौती बहू बनकर जिंदगी भर की आफत मोल ले ली तूने, ऐसे ही भाग भाग कर जाना पड़ेगा गांव में” निक्की की सहेली ने नाराजगी जताते हुये कहा|

 

 निक्की से इस बार चुप नहीं रहा गया| वो गंभीर होकर बोली 

“हां वहां लम्बे घूंघट का चलन है लेकिन जब वो ये कहते हैं कि बहू ये गांव है तुम शहर जाकर अपने मन जैसा रह लेना तब मुझे वो कहीं से गंवार नहीं लगते| 

सासू मां चाहतीं हैं कि मैं ढोलक की थाप पर महिला संगीत में धूम मचाऊं लेकिन मैं फिसड्डी हूं ये जानकर वो गांव की औरतों से “इन पढ़ने लिखने वाली लड़कियों को कुछ नहीं आता” कहकर मेरा पीछा छुड़ा देती हैं उस वक्त मुझे वो बहुत स्मार्ट लगतीं हैं|

हां वहां खाना आज भी पारम्परिक चूल्हे पर बनता है लेकिन “बहू तुम्हें काम करने का ढंग नहीं है” कहकर सासू मां का आगे बढ़कर खाना बनाने बैठ जाना ताकि चूल्हे का धुंआ मेरी आंखों में ना लगे| “तुमसे बर्तन साफ नहीं धुले जाते” कहकर बर्तन मेरे  हाथ से छीन कर  खुद मांज लेना ताकि मेरे हाथ काले ना हों| उस समय उनके व्यंग में  मुझे छिपी हुई उनके गांव और मेरे शहर के होने की झिझक नजर आती है 

तुम लोगों को पता है? उम्र के सत्तरवें दशक में मेरे सास ससुर ने गायें पाली है ताकि मैं बिना किसी नानुकुर के दूध पी सकूं| “आजकल की लड़कियों के चोचले” कहकर मेरे लिये घर का बना घी हमेशा तैयार रखना, मेरे घर पहुंचते ही खेतों से मौसमी फल सब्जी लाने के लिये ससुर जी का धूप में भी दौड़ जाना और उधर से बड़े झोलों से लदकर धूल मिट्टी में सन कर लौटना,… इस गंदगी में भी मुझे गहरा प्यार झलकता है|

 

वो लोग अनपढ़ जरूर हैं मगर मेरी पढ़ाई लिखाई पर घमण्ड भी खूब करते हैं, नौकरी करना या ना करना पूरी तरह मुझ पर निर्भर है| माना उनकी जुबान देशी है अन्दाज देशी है लेकिन बनावटीपन बिल्कुल भी नहीं है, वो उस नारियल की तरह हैं  जिसका आवरण कठोर मगर अंदर से बिल्कुल नरम और मीठा होता है| सच है वो हमारे जितना आधुनिक नहीं हैं लेकिन अब दो अलग संगतें मिल गयीं हैं तो थोड़ा वो बदल रहे हैं थोड़ी मैं बदल रहीं हूं, अभी मुझे घूंघट थोड़ा छोटा करने की छूट मिली है धीरे धीरे और भी बदलाव आयेंगे | 

 पढ़े लिखे हम हैं वो लोग नहीं इसलिये हम उनसे लड़ झगड़ कर रातों रात सब कुछ नहीं बदल सकते, उनका रहन सहन हो या सोच धीरे धीरे ही बदलेगी| जब मैं उन्हें अपने साथ नयी नयी जगह घुमाकर बाहरी दुनिया से रूबरू कराऊंगी तभी उनकी सोच का सीमित दायरा टूटेगा|

और सबसे जरूरी बात मुझे अपने गांव वाली ससुराल पर बिल्कुल शर्म नहीं आती क्योंकि वहां मुझे अपने घर के साथ साथ पूरे गांव की बहू होने का सम्मान मिलता है, खेत खलिहान मेरे हैं इसलिये गांव में रहना मेरी मजबूरी नहीं मेरी खुद की इच्छा है, अगर पति की नौकरी मेरा लालच है तो ससुराल मेरी जिम्मेदारी है जिसे मैं नि:स्वार्थ निभा रही हूं “

निक्की की बातें सुनकर वहां खामोशी छा गयी| बड़बोली सहेलियां झेंप गयीं थीं| “सच है ससुराल गांव या शहर से नहीं वहां के लोगों से अच्छी या बुरी बनती है, कहीं गांव में अनपढ़ लोग भी बहू को लक्ष्मी मानते हैं तो कहीं शहर के पढ़े लिखे लोग बहू को इंसान का दर्जा भी नहीं देते ” निक्की की एक सहेली ने कहा तो सबने मौन स्वर में उसकी हां में हां मिला दी|

 

धन्यवाद दोस्तो

लोगों की सोच से घर स्वर्ग या नरक बनता है, फिर वह गांव हो या शहर, आज सुख सुविधाओं की होड़  से ज्यादा आपसी प्यार और  मानसिक शान्ति जरूरी हो गयी है और ये प्यार व सुकून आपको गांव या शहर कहीं भी मिल सकती है| गांव का मतलब है खान पान, रहन सहन, और बोली भाषा से प्राकृतिक होना बिना किसी आडम्बर के| गांव अर्थात गंवार सोच होना नहीं बल्कि पुरानी परम्पराओं के लिये गहरी मान्यता होना है और हर परम्परा बुरी हो ये भी जरूरी नहीं| कुरीतियों को खत्म करना हम पढ़े लिखे लोगों की जिम्मेदारी हैं लेकिन रातों रात नहीं बस प्यार और समझदारी से धीरे धीरे|

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आपकी दोस्त

प्रज्ञा तिवारी

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