सबक

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सबक

“माँ! तुम जज थी फिर भी मुझे नहीं जिताया। मेरे साथ ऐसा क्यों किया माँ?”
मेरी छः वर्षीय मासूम बच्ची सवाल कर रही थी। उसके सवाल मुझे व्याकुल कर रहे थे। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि उस छोटी सी उम्र में उसे अपने अंतर्द्वंद्व के बारे में कैसे बताऊँ। दरअसल उसकी ही सहेली के जन्मदिन की पार्टी थी। वहां कई प्रकार के खेल हो रहे थे। बच्चों के एक नृत्य के लिए मुझे जज बनाया गया। गुलाबी चेहरे पर विजयी मुस्कान लिये पीहू मेरी ओर देख कर लगातार थिरक रही थी। उसके चेहरे की वह चमक अनूठी थी। भुलाये नहीं भूलती। बड़ी उम्मीद से वह मेरी आँखों में देख रही थी। जैसे अपनी जीत का उसे पूरा विश्वास हो। एक तो उसका रूप और दूसरे नृत्य दोनों ही एक -दूसरे के पूरक लग रहे थे। प्यारी बिटिया का ये नृत्य इतना लुभावना था कि झट सीने से लगाने के लिए दिल मचल रहा था। एक और बच्ची अच्छा नाच रही थी। मुझे फैसला लेना था। मेरे पास वक्त कम था। अजीब पेशोपेश में थी। मेरी जगह कोई और होता तो निश्चित ही पीहू  विजयी होती।
बड़ी धर्मसंकट की घड़ी थी। मैं अच्छी माँ बन अपने बच्चे की हौसला अफजाई कर सकती थी या फिर अच्छा इंसान बन निष्पक्ष रह सकती थी मगर कुछ सिद्धांत माँ-बेटी के बीच में आ गये। मैंने पीहू की निकटतम प्रतिद्वंद्वी नेहा को विजयी घोषित कर दिया। पीहू मुरझा गई थी। बहुत देर तक खामोश रही। उसे उदास देख कर मेरा मन भी रो रहा था। ‘माँ जज थी इसलिए बेटी को जिताया’ एक इस इल्जाम से तो बच गई पर सदा के लिए अपनी बेटी का अपने प्रति अंध-विश्वास खो दिया। वह जान चुकी थी कि उसका अधिकार अपनी माँ के स्नेह पर है, निर्णयों पर नहीं! साथ ही वह समझ गई थी कि जीवन में हार या जीत जो भी मिले उसे स्वीकार करना पड़ता है।

इस घटना के बाद पीहू में अनेकों सकारात्मक परिवर्तन हुए। उसके बाद से वह अपनी हर जंग अपनी मेहनत के बल पर जीतती गई। जिंदगी का सबसे बड़ा सबक उसी छोटी उम्र में ही मिल गया था कि जो कुछ करना है वह अपनी ही काबिलियत के दम पर करना होगा, माता-पिता के बल पर नहीं!
आर्या झा
मौलिक व अप्रकाशित

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