वो बेपरवाह बचपन

बाकी महानगरो की तरह ही है हमारा शहर भी,जगह जगह उग आए कॉक्रीट के जंगल,जहरीली हवा,और कान फोडू आवाजे़,13सालो इन सब के साथ तालमेल बिठाने की नाकाम सी कोशिश कर रही हूँ,फिर भी न जाने कैसे मन भटकता हुआ वापस उन्ही बचपन की गलियों में पहुँच जाता है,जहाँ सारे घर अपने होते थे,हरे भरे बागीचों से हम बिना पूछे ही आम,अमरूद तो कभी बेर तोड कर खा लिया करते थे,माँ बाप को डरना नहीं पडता था,कि अरे बच्ची बाहर है सुरक्षित तो होगी ना।

खैर तो इन कॉक्रीट के जंगलो के बीच हमारा भी फ्लैट है,और हमारी बिल्डिंग के सामने पड़ी छोटी सी खाली ज़मीन है ,जिसे घर बनाते समय बिल्डर नें वादा किया था कि वो वहाँ बच्चो के लिए पार्क बनाएगा,तब से लेकर अब तक उसे इसकी सुध भी नहीं है,तो वहाँ कुछ गरीब परिवारो नें अपनी झोपडियां बना ली ,और आम अमरूद के पेड लगा दिए,शायद शहर में यही वो हिस्सा होगा जहाँ दो चार पेड़ दिख जाते है,वरना अब तो आलम यह है कि सड़क पर जाते हुए कही पेड दिखे तो बच्चो को दिखाना पडता है”देखो बेटा इसे पेड कहते हैं”,वो झोपडियां इन मल्टी स्टोरीड बिल्डिंग में रहने वालो के लिये यूँ थी,मानो किसी ने मखमल में ताट का पैबंद लगा दिया हो,किसी को भी फूटी आँख नहीं भाती थी,उनमें रहने वाले बच्चे सरकारी स्कूल में पढते थे,और छूट्टी के बाद बस तितलियों की तरह बिखर जाते थे यहाँ वहाँ।

 

पेड पर पुरानी साडी से झूला बाँध लिया था,कभी झूला झूलते,कभी पेड पर लटकते,कभी टीचर बन एक दूसरे को पढ़ाते,कभी,पुराने दिये और टूटे फूटे ढक्कनों को जोडकर छोटी सी रसोई बना घर घर खेलते,कभी एक दूसरे से रूठते तो दूसरे ही पल मना भी लेते,बिल्कुल बेपरवाह से थे वो,पहनने ओढने का ढंग भी नहीं था,अक्सर नाक भी बहती रहती थी,किसी ना किसी की,कभी बारिश होती तो खूब भीगते,ठंड मे आग जलाकर सेकते हुए जाने कहाँ कहाँ की बाते करते,गर्मियों की घूप भी बेअसर थी उनपर,मै शाम की चाय का कप लिए जैसे उन्ही का इंतज़ार करती थी,और फिर घंटो बाल्कनी में खडी उन्हे निहारा करती।
फिर अचानक ही हमरे बिल्डर को अपनी ज़मीन याद गई, और बिना समय गवांए उसने उन घरो में बुल्डोजर चला दिया,उन पेडो को बेरहमी से कटवा दिया,और इसकी खुशी में बकायदा एक पार्टी रखकर ऐलान किया,कि जल्द ही वहाँ, सर्वसुविधायुक्त पार्क बनेगा ,जहाँ हमारे सो काल्ड कार्नवेंट में पढने वाले बच्चे,स्केटिंग, बास्केटबॉल, क्रिकेट,आदि खेल पाएगें।सभी अभिभावक बेहद खुश थे,और राहत की सांस भी ले रहे थे,चलो वो झोपडियां तो हटी,हमारी बिल्डिंग का लुक ही खराब कर दिया था उन्होने,पर न जाने क्यों मेरी आँखो में आँँसू थे,कायदे से मुझे भी खुश होना चाहिए था मेरी बेटी को भी खेलने की अच्छी जगह मिलेगी,और आखिर मैं भी तो इस हाई सोसाइटी का हिस्सा हूँ,फिर क्यों मेरी आँखो में आँसू थे…..शायद उन बच्चों के साथ मैं दोबारा अपना बचपन जी रही थी,जो बिल्कुल बेपरवाह था उन्ही की तरह।

ये कहानी नहीं सच्चाई है।शायद हम सबने ऐसा ही बचपन जिया है..है ना।आपके बचपन से जुडी यादो का स्वागत है,

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