वाह री सोच


“वाह रे समाज की सोच वाह रे”

बलात्कार किया उसने और अपवित्र मै हो गई,

सोच हवस की उसकी थी और बदनाम मै हो गई

हैवानियत आंखो में उसकी थी और बेशर्म में हो गई

पाप उसने किया आजाद वो है और कैद मै हो गई

दरिंदगी से भरा था उसका मन और शिकार मैं हो गई,

हरकतेें उसकी नग्न थीं और निर्वस्त्र मै हो गई,

नोच डाला था शरीर के साथ आत्मा तक उसने,

गुनहगार वो था, जबकि सजा मेरे हिस्से में हो गई,

वाह रे समाज की सोच बलात्कार किया उसने,

और अपवित्र मैं हो गई

वाह रे समाज आंखे खोल पाखंड की हद हो गई,

वाह रे समाज वाह री सोच ।

(नेहा सिंह )

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