लंदन वाली दीदी

“सुनो, मीना दी ने इसी संडे अपने घर बुलाया है” मैंने राकेश के घर आते ही चहकते हुए कहा।

“मीना दी या मिन्नी दी?” राकेश ने मेरी खिंचाई करते हुए मुझसे सवाल किया।

“जो भी हो, हैं तो दोनों एक ही” मैं खीज कर बोली।

“एक ही कैसे? तुम्हारी मीना दी तो करगहर की थी और मिन्नी दी तो लंदन वाली हैं” राकेश ने फिर मेरी खिंचाई करनी चाही।

“हो गया मजाक? मुझे थोड़ी भी हंसी नहीं आई। इस संडे उनके घर जा रहें हैं, बस इतना जान लो” यह बोलकर मैं चाय बनाने किचन की तरफ बढ़ी।

पति को तो चिढ़ाने पर झिड़की देकर डांट दिया, पर सच कहूँ तो मीना दी भी मजेदार कम नहीं। मीना दी मेरी ममेरी बहन। सासाराम के पास के छोटे से कस्बे में मेरा नानी घर है। मीना दी का बचपन भी वहीं बीता। मामा वहीं कस्बे में एक सरकारी स्कूल में टीचर थे। मीना दी भी उसी सरकारी स्कूल में पढ़ती थीं। मैं कभी नानी घर जाती तो मीना दी के साथ उनके स्कूल चली जाती। वहाँ सभी बच्चे जूट के बोरे पर बैठ कर पढ़ाई करते रहते थे। मुझे यह सब देख हंसी भी आती, मजा भी।

मैं मीना दी को बनारस के अपने स्कूल के बारे में बताती। मैं बनारस के जिस स्कूल में पढ़ाई करती थी वह उस शहर का सबसे बेहतरीन अंग्रेजी मीडियम स्कूल था। मैं जब उन्हें अपने स्कूल के बारे बताती तो वह मामा से मेरे ही स्कूल में पढ़ने की जिद करने लगती। यह सब देख मेरी माँ ने भी कई बार मामा से मीना दी को बनारस भेज देने के लिए कहा, पर मामा ने बनारस न भेज उसी कस्बे के उसी सरकारी स्कूल में उनका पढ़ाई जारी रखी।

मीना दी ने वहीं से दसवीं की परीक्षा पास की। दसवीं करने के बाद वो बनारस में रह कर पढ़ाई करने की मामा से जिद करने लगीं। इस बार मामा मान गये और फिर वह बनारस आकर हमारे घर रह कर लगी पढ़ाई करने। मीना दी मेरे कमरे में रहती। उनके आने पर मुझे लगा कि जो बड़ी बहन की कमी थी अब पूरी होने वाली है, पर ऐसा नहीं हुआ। वो तो हिसाब की पूरी पक्की निकली। मेरे ही रूम को आधा-आधा बांट दिया साथ ही बिस्तर को भी। मुझे उनके तरफ किसी भी कीमत पर चाहे दिन हो या रात जाने की इजाज़त नहीं थी।

एक दिन मीना दी के साथ मैं मार्केट गई। मीना दी और मैं वहाँ गोलगप्पे खाये। सब मिला कर चौदह रूपये हुए थे। मीना दी ने अपने सात रूपये दिये और मुझे अपने सात रूपये देने का निर्देश दे दिया। सच कहूँ तो मुझे उस दिन बेहद गुस्सा आया था। मैं सोचने लगी थी मेरे ही घर पर रहती है। मेरे ही कमरे में अपना अड्डा जमाई हैं, फिर मेरे ही पापा के लाये अनाज और मेरी माँ के हाथ के बनाये खाना खाती हैं। उसके बाद भी इतनी सारी नौटंकी करती हैं।

मैं तो उस दिन सोच ली थी घर पहुँचते ही उन्हें पहले अपने कमरे से फिर अपने घर से निकाल बाहर करूंगी, पर माँ से उनकी शिकायत करने पर माँ ने मुझे ही समझाकर चुप करा दिया। उस दिन के बाद से मैं उनसे थोड़ी कटी-कटी रहने लगी थी, बस काम भर मतलब। मीना दी इंटर करने के बाद मामा जी से दिल्ली से ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने की जिद करना शुरू की। मैं भी चाहती थी कि वो जितना जल्दी हो सके मेरे घर से जाएं, लेकिन मामा जी उन्हें दिल्‍ली भेजना नहीं चाहते थे। मीना दी ने ऐसी जिद पकड़ी कि मामा जी अंततः मजबूर होकर उन्हें ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने के लिए दिल्ली भेज ही दिया।

अब मीना दी से मिलना छुट्टियों में ही होता। वह दिल्ली की ट्रेन बनारस से ही पकड़ती थी और दिल्ली से आते समय भी बनारस ही ट्रेन से उतरती थी। दूसरे दिन फिर बस पकड़ करगहर चली जाती। वह जब से दिल्ली में पढ़ाई करने लगी थी, जब भी बनारस आती हम सब से ज्यादा अंग्रेजी में ही बातें करती। माँ भी उनको अंग्रेजी बोलते देख बेहद खुश हो जाती और मुझे हमेशा उनका उदाहरण देती। माँ का कहना होता कि वह सरकारी स्कूल से हिन्दी मीडियम से पढ़ाई करने के बाद भी, बस कुछ सालों से बाहर रहने पर ही इतनी अच्छी अंग्रेजी बोल लेती हैं और मैं शुरू से अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाई कर सिर्फ हिन्दी में ही बातें करती हूँ। मैं उस समय माँ की ये सब बात सुन उनमें मीना दी का ही कोई रूप ढ़ूढ़ने का कोशिश करती। हैरान होती ये सोचकर भला अपने घर पर अंग्रेजी कौन बोलता है।

मीना दी की उस समय सिर्फ बोली ही नहीं बदली, उनकी चाल-ढ़ाल, कपड़े पहनने के तरीके सब बदल गयें। कमर तक चोटी वाली मीना दी खुले लेजर कट बालों में आ गई। कमीज़ सलवार के साथ दुपट्टे लेने वाली वो टाइट जींस और टीशर्ट पहनने लगीं। दिल्ली जाते ही वह मीना से मीनू हो गई थी। सबसे बड़ी बात यह कि जो बचपन से अपने माँ-बाप को माई-बाबूजी कहती थी, वो उन्हें अब मम्मी-पापा बुलाने लगीं। मेरी माँ फुआ से बुई हो गई। मैं स्वीट लिटिल सिस्टर।

खैर, दिल्ली जाते ही मेरा भी उनसे रिश्ता सुधरने लगा। जैसे ही उनका पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा हुआ, मामा उनके लिए लड़का तलाश करने लगें। कई अच्छा रिश्ता मीना दी ने इस लिए ठुकराया क्योंकि लड़का छोटे शहर में नौकरी करता था। एक सरकारी बैंक का अधिकारी का रिश्ता मेरे पापा ने अपने ही जान पहचान में बताया था। लड़का मुंगेर के सरकारी बैक में अधिकारी था। मीना दी ने रिश्ता यह कह कर ठुकराया वह इतने छोटे शहर में नहीं रह सकती। उन्होंने अपनी शादी की शर्त यह रखी कि कम से कम ससुराल वाले शहर में एयरपोर्ट हो। उसके बाद शुरू हुआ मामा के चप्पल घिसने की काम।

पूरे चार साल के भाग-दौड़ के बाद एक लड़का मिला जो लंदन में नौकरी करता था। मीना दी ने ना लड़के से बात की और ना ही उसका कोई फोटो देखा, बस लंदन का नाम सुन शादी के लिए हाँ कर दिया। खैर, सबसे अच्छी बात यह रही कि मीना दी को भी उन लोगों ने पसंद कर लिया और मीना दी हो गईं लंदन वाली। लंदन पहुंचते ही मीना दी बन गई मिन्नी। फेसबुक पर भी वह इसी नाम से हैं। गलती से कोई उन्हें मीना दी बोल दे तो भड़क जाती हैं। वहाँ जाने के बाद तो लगता है उन्होंने फुल लेंथ वाले कपड़े भी त्याग दिये हैं। फेसबुक और वाट्सएप पर जो भी फोटो वो डालती हैं उनमें बेहद छोटे कपड़ों में ही नजर आती हैं।

मेरे पति राकेश को कम्पनी ने पिछले महीने ही पूरे एक साल के लिए लंदन भेजा है। मैं पिछले हफ्ते ही लंदन आई हूँ। लंदन आने से पहले ही मैंने अपने आने की खबर मीना दी को दी थी। उन्होंने आज सुबह ही फोन कर इस संडे ही हम दोनों को अपने घर बुलाया है। मीना दी से पहले ही मेरे रिश्ते थोड़े सुधर गए थे और फिर अनजान देश में किसी रिश्तेदार का होना निस्संदेह अच्छा अहसास कराता है। मैंने ठान लिया कि इस इतवार उनके घर जाना है। इतवार के दिन हम उनके घर पहुँचे। मीना दी दरवाजे पर ही खड़ी मिलीं। उन्हें और उनकी बेटी को देख एक बार तो तेज हंसी आई, पर बहुत मेहनत से मैंने उसे रोक लिया।

तभी पति ने कान में फुसफुसा कर कहा “ये दोनों यहाँ किसी सर्कस में काम करती हैं क्या?” मैंने पतिदेव को घूरा और मीना दी को गले लगाने आगे बढ़ी। मीना दी छोटे कपड़ों के साथ पूरे अजीब मेकअप में थी और उतना ही मेकअप अपनी पाँच साल की बेटी के चेहरे पर भी थोपा था। हम अभी बैठे ही थे कि मीना दी ने मुझे टोका “क्या सिस अभी भी इस फुल लेंथ जींस में ही हो? ये सब क्लोथ्स को इंडिया में ही छोड़ देना था। ये सब यहाँ नहीं चलता। थोड़ा माडर्न बनो और शार्ट स्कर्ट, शार्ट पैंट खरीदो”। उनकी यह सब बातें सुन मैंने मुस्कुरा कर अपना सिर हिला दिया।

“आप अब करगहर नहीं जाती दी?” मैंने मीना दी से सवाल किया।

“कौन जाये उस गांव में, ओह! वहाँ एयरपोर्ट तक नहीं। बहुत थकावट हो जायेगी इसलिए नहीं जाती”|

“पर बनारस में तो एयरपोर्ट है ना? आप वहाँ तक फ्लाइट से जाओ और फिर कार से वहाँ तक चले जाओ। दो घंटे से ज्यादा तो नहीं लगेगा”|

“किसके पास इतना टाइम है बर्बाद करने के लिए? वो माॅम-डैड ही बस, ट्रेन से लटक के आ जाते हैं मुझसे मिलने दिल्ली मेरे ससुराल ही। यू नो ना, उनका चलता है। उन्होंने तो जिंदगी भर यही किया है, इसलिए वो ये सब कर सकते हैं बट मुझसे नहीं ये सब होने वाला” हिंदी भी अंग्रेजों की तरह बोल-बोल कर मीना दी अजीब सा स्टाइल दे रही थी।

मैं और राकेश उनकी यह सब हरकत देख मुस्कुरा रहे थे। अचानक कुछ गिरने की आवाज आई। हम भागकर किचन की तरफ बढ़े तो देखा, उनकी बेटी के हाथ से एक बड़ा से आइसक्रीम का डब्बा नीचे गिर गया है और पूरी आइसक्रीम फर्श पर।

“दू मिनट इ लइकी के चैन ना मिलेला। एक मिनट एकरा पर से ध्यान का हटल पूरा काम हमार पसार देलस। मन करता मार के एकर टंगड़िये तोड़ दी। एक त एहिजा दाई ना मिलेले ऊपर से इ लइकी जब देख त हमार काम बढ़ा देले ( दो मिनट इस लड़की को चैन नहीं है। एक मिनट इस पर से मेरा ध्यान क्या हटा मेरा पूरा काम बढ़ा दी। मन कर रहा मार कर इसका पैर तोड़ दूं। एक तो यहां मेड नहीं मिलती और जब देखो तो ये लड़की मेरा काम बढ़ा देती है”|

मीना दी गुस्से में पूरी करगहर वाली मीना दी बन चुकी थी। कब अंग्रेजी स्टाइल में हिन्दी बोलने वाली मीना दी गुस्से में भोजपुरी में उतर आई थी, उन्हें पता तक नहीं चल पाया था।

“मैं कुछ हेल्प करूं दी?” मैं मदद के लिए किचन के अंदर गई।

“नो नो, आई कैन मैनेज एलोन… गो एंड सिट देयर”

“अरे! छोड़ो न मीना दी लाव करे द हमरा तनी। आखिर छोटे बहिन न बानी तोहार (अरे! छोड़ो ना मीना दी। लाओ करने दो मुझे। आखिर मैं तुम्हारी छोटी बहन हूं)” यह बोल के मैं खिलखिला कर हंस पड़ी।

मुझे भी भोजपुरी में बोलते सुन कर मेरे पतिदेव के साथ मीना दी के पति, यानि मेरे जीजाजी भी खिलखिलाकर हंस पड़े। यह देख मीना दी भी झेप पर मुस्कुरा पड़ीं।

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One Thought to “लंदन वाली दीदी”

  1. Arya jha

    हाहा….मज़ेदार कहानी

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