रेडियो

 

 

    रेडियो मेरा प्रिय उपकरण है।  मैं बचपन से रेडियो सुनती आ रही हूं। रेडियो सुनते सुनते अपने काम  कहा हो जाता है मालूम नहीं पड़ता। एक बार मेरी माता अपने मैंके  गई थी।

सारा काम मेरे पर आ गया था। मैं रेडियो सुनती जाती थी और अपना काम करती जाती थी। एक बार मेरा रेडियो खराब हो गया।  माता और  रेडियो दोनों को याद करते हुए मैं मन ही मन में गीत गाती थी,”तुम्हारे बिना जी नहीं लगें घर में।”

  फिर  मेरी शादी बड़े परिवार में हुई।  सभी के लिए भोजन बनाने में ज्यादातर रसोईघर में ही रहती थी। अभी भी  मैं रेडियो सुनती रहती थी।

बाहर सभी टीवी  देखते थे। अभी  मुजे टीवी का उतना छंद (आदत) नहीं लगा था। फिर  कुछ सालों के बाद बच्चों के साथ टीवी देखने की आदत हो गई। कुछ सालों बाद मोबाइल आया।  टीवी देखते हुए किसी का फोन आता तो मैं कह देती,” अभी मैं मेरा फलां प्रिय कार्यक्रम देख रही हूं। बाद में फोन करती हूं।”

फिर टीवी की  मैं आदि हो गई। बाद में स्मार्ट  मोबाइल आया । टीवी देखते हुए मोबाइल से अपनों से मैसेजों में  बात चीत करने की आदत हो गई। रेडियो पर धूल की परतें जमने लगी थी। एक बार टीवी चैनलों के प्लान का  शुल्क भरना भूल गए!!! टीवी काला धब्ब। टीवी स्क्रीन पर सूचना आयी शुल्क भरना होगा!!!मुजे ओन लाइन पेमेंट करना नहीं आता। बच्चें कर देते हैं। मुजे रेडियो याद आ गया। मैं रसोई घर से रेडियो होल में लायी। बड़े प्यार से अपनी साड़ी से मैंने रेडियो को पोंछा। धूल की परतें दूर हो गई। रेडियो का प्लग लगा कर मैंने रेडियो स्वीच ओन किया। तुरंत रेडियो  शुरू हो गया। रेडियो से मुजे अपना बचपन याद आ गया। सचमुच  रेडियो तो रेडियो है। उसका स्थान कोई नहीं ले सकता।

भावना मयूर पुरोहित हैदराबाद

 

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