राम बस नाम नहीं …

6 दिसंबर1992, जब बाबरी मस्जिद पर हमला हुआ, लोगों में अलग तरह का उत्साह था। अयोध्या ही नहीं पूरे देश में राम नाम की गूंज थी, सड़कों पर ऐसे सैकड़ों लोगों का हुजूम था जो वहां प्रत्यक्ष रूप से शामिल तो नहीं हो पाए थे, लेकिन उनके दिलों में राम नाम की ज्वाला उतनी ही प्रज्वलित थी, जितनी अयोध्या की उस संकरी गली में उमड़ती भीड़ के अंदर थी। 6 दिसंबर, 1992 की इस घटना के बाद देश में क्या हालात हुए, किस तरह से रोष प्रकट किया गया, आम जनता को किन हालातों से गुज़रना पड़ा, ये सब तो अब इतिहास बन चुका है, और शायद हम सभी जानते हैं। लेकिन आज की पीढ़ी जिसे शायद इस घटना का इल्म भी नहीं होगा, उसे केवल एक ही बात सताती है कि आखिर ऐसी भी क्या बात थी जो मस्ज़िद तोड़ी गई, उस घटना को याद कर जब भी वो अपने बड़ों के चेहरे देखते हैं कई सवाल मन में उमड़ जाते हैं। उन्हें तो बस यही पता है कि राम हिन्दुओं के भगवान का एक नाम है, लेकिन सच तो यही है कि राम बस एक नाम नहीं है। ये एक सोच है.. सोच कि दुनिया में किसी भी व्यक्ति की पहचान उसकी जाति से नहीं बल्कि उसके कर्मों से होती है। राम बस नाम नहीं, एक व्यक्तित्व है… व्यक्तित्व जो अपने स्वभाव, अपनी नम्रता से बड़ा बना, एक ऐसे व्यक्तित्व जिसके लिए राजधर्म सबसे ऊपर था। राम नाम है त्याग का… त्याग अपनी खुशियों का, अपने स्वार्थ का, अपनी लालसाओं का। राम बस नाम नहीं.. ये मार्ग है, असत्य से सत्य की ओर चलने का, राम नाम है पुरुषत्व का… पुरुषत्व जिसने नारी को उचित सम्मान दिया, पतिव्रता तो कई हुईं, लेकिन राम, वो सदा पत्नीव्रता रहे।

देखा जाए तो राम अपने आप में एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व थे, ऐसे व्यक्तित्व के प्रति हमारी आस्था का प्रतीक है वो अयोध्या में बन रहा राम मंदिर.. लेकिन, कैसे समझाएं हम इस पीढ़ी को कि सिर्फ मंदिर बना कर हम आदर्श के प्रति सच्ची आस्था नहीं दिखा सकते, अगर वाकई हम चाहते हैं कि हमारी आज की पीढ़ी भी राम को बस एक नाम ना समझे, तो बहुत ज़रूरी है कि हम उन्हें इस नाम के पीछे का असली अर्थ बताएं। ये बताएं कि राम नाम को मंदिर से पहले अपने दिल में, अपने चरित्र में और अपने आचरण में बसाना होगा, तब जानेगें कि राम नाम सत्य क्यों है ?

पल्लवी पाठक

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One Thought to “राम बस नाम नहीं …”

  1. Arya Jha

    Too good Pallavi…..loved this

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