मेरा प्यार

हिंदी दिवस पर विशेष:

 

 

 

                             मेरा प्यार

 

“सुनो पढ़ना इसे! पन्ने पढ़कर गंदे हों  धूल से नहीं।”

हाथों में मोटा सा उपन्यास थमाते हुये आदित्य ने जब ये कहा तो मेरे होश फ़ाख्ता हो गये थे।

 

“हाँ”

 

बस इतना ही कह पाई थी। किताब वजनी थी, उठाने में भी और पढने में भी। कहाँ मेरे जैसी शरारती लड़की व कहाँ वह धीर- गंभीर पुरुष। हमारा कोई मैच ही नहीं था पर उनकी शराफत पर अपना दिल भी मचल चुका था। हिम्मत जुटा कर किताब खोला जरुर,पर जल्दी ही बंद कर दिया। एक जगह टिक कर बैठना ही मेरे लिये दुष्कर कार्य था ऐसे में इतनी मोटी किताब भला कैसे पढती? खेल-कूद चाहे जितना कर लूँ पर पढाई-लिखाई तो बस इम्तिहान के दिनों में ही किया करती थी। बाकी दिनों में सिनेमा और क्रिकेट मैच,यही दो मुख्य शौक थे मेरे। बड़ी असमंजस की घड़ी आन पड़ी थी। प्रेम की शुरुआत ही हुई थी और उसकी परीक्षा देनी पड़ रही थी।उन्हें दुखी करने की इच्छा ज़रा भी नहीं थी पर खुश करने के लिए इतनी मोटी किताब सहर्ष पढ़ना शुरु कर दूँ यह भी मेरे बस में ना था। किताब भेंट किये हुये जब एक हफ्ते निकल गये तब उन्होंने बढ़ कर पूछ ही डाला कि “कितनी पढी?”

 

“अभी शुरु ही कहाँ की है….बहुत लंबी है। ‘मिल्स ऐण्ड बून’होती तो कब के खत्म हो गई होती।”खींसे निपोरते हुये अपने पक्ष में दलील रख दिया।

 

“सिली गर्ल!अंग्रेजी उपन्यास पढ़कर हिन्दुस्तानी मोहब्बत समझोगी? मेरे दिल की गहराइयों को जानना-समझना चाहती हो तो धर्मवीर भारती की ‘गुनाहों का देवता’पूरी पढ़ डालो।” उफ़! यह कहते हुये कितने प्यारे लग रहे थे। उनकी हँसी में एक शोखी सी घुल गई थी। मेरी नजरें उनके चेहरे से हटती ना थीं।

 

“कोशिश करूंगी।” उनकी हँसती आँखों में झाँकते हुये कह दिया।

 

फिर क्या था….. मरती क्या ना करती….बस चढ़ गई सूली पर….प्यार किया था उनसे। उनके दिल की बात समझना मेरी पहली चाहत थी। उन पर भी एकबारगी गुस्सा आई।जो बात सीधे -सीधे कह सकते थे और मैं कान खोल कर सुन सकती थी, उसके लिये इतना लंबा रास्ता क्यों चुना? खैर प्यार तो प्यार होता है। उसमें उनकी चाहत का सम्मान करना बनता था। वह इतने संजीदा स्वभाव के थे कि  अपने बारे में खुलकर कुछ भी ना कहने वाले थे। बंद किताब समान उनके संयमित चरित्र के विस्तार को जानने के लिये आखिर हमने उपन्यास पढ़ने की मुहिम शुरु कर ही दी।

 

पढने से पहले मार्ग में जो भी बाधाएं थीं,उपन्यास की रोचकता के कारण वह स्वत: ही दूर होतीं गयीं। कुल तीन दिन लगे और उपन्यास खत्म कर लिया। अब वह मुझे भलीभाँति समझ में आने लगे थे। उनका हृदय शीशे सा साफ़ था। भूले से भी किसी को दर्द देने वाले नहीं बल्कि तकलीफें साझा करने वालों में से थे। ‘गुनाहों का देवता’ पढकर ही समझ पाई कि क्यों वह मुझे छोटी बच्ची सी समझते हैं….. वह क्यों हर वक़्त मेरी चिंता में डूबे रहते हैं….. हर छोटे -बड़े कदम उठाने से पहले उन्हें मेरी फ़िक्र क्यों उद्वेलित करती है।

 

और तो और उपन्यास के आखिरी पन्ने पर जो चंद शब्द मेरे लिये लिखे थे उन्हें पढ़कर बरबस ही आँखें छलक आईं।

 

“तुम बेशक मुझसे प्यार करती हो पर मुझे जाने – समझे बिना। जिस दिन जान लोगी, समझदार हो जाओगी।”

 

शुभकामनाओं सहित

आदित्य

 

उसके बाद तो कहानियों और कविताओं का ऐसा सिलसिला चला कि बस चलता ही गया। वह लिखते गये और मैं पढ़ती गई। उनकी रचनाओं में खुद को पाकर खुशी से फूली ना समाती। उन दिनों मेरे पाँव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। यह सब मेरे साथ पहली बार हो रहा था। इससे पहले मैं अपने कॉलेज की सीनियर’सीमा श्रीवास्तव’दीदी  की ‘अंध -भक्त’ थी। उन्होंने ग्रेजुएशन में तीनों साहित्य (सँस्कृत,हिंदी व अंग्रेजी) रखा था और सुंदर कविताएँ भी लिखती थीं। वक़्त की महिमा तो देखिये कि अब मेरे पास एक ऐसा कवि था जो मुझपर कविताएँ लिखता था। जिसके रात और दिन मेरे लिये ही रचनाएं रचने में गुजर रहे थे। सीमा दी के संपर्क में आने के बाद सहित्य के लिये जो अगाध श्रद्धा पनपी थी। आदित्य ने उस बीज को खाद-पानी दे दिया। वह बीज अंकुरित होकर पौधे के रुप में प्रस्फुटन के लिये तैयार था।

 

अब मुझे भी पक्का विश्वास हो चला था कि हो ना हो मुझे प्यार हो गया है और वह भी सौ फीसदी वाला। अरे!ना…ना… उनसे नहीं बल्कि हिंदी सहित्य से। कहीं आप गलत तो नहीं समझ बैठे? मेरे पास भी कहानियों व कविताओं का संकलन तैयार हो गया। जिनमें सर्वोच्च स्थान ‘गुनाहों के देवता’को मिला और भला क्यों ना मिलता। अर्थशास्त्र की विद्यार्थिनी को साहित्य की ओर इस पुस्तक ने ही तो मोड़ा था। उसके बाद एक जुनून सा सवार हो गया। पढ़ने की ललक ऐसी जगी कि शिवानी के सारे उपन्यास पढ डाले। गोपालदास ‘नीरज’ और ‘बशीर बद्र’ की कवितायें पढीं। आदित्य का कहना था कि हिंदी लिखो या बोलो तो शुद्धता बनाए रखो। भाषा का सम्मान करना सीखो। तब से ही मैंने हिंदी में अंग्रेजी की मिलावट बंद कर इस भाषा को समुचित स्नेह व सम्मान देना शुरु कर दिया।

 

आदित्य को जानने- समझने के क्रम में मैं हिंदी साहित्य में  गहरे पैठ गई। कल्पनाओं की ऊँची उड़ान उड़ने में असीम आनंद की अनुभूति होने लगी। अंतर्मन को संतुष्टि मिली तो मैं जग से हटकर अपनी ही दुनियां में जीने लगी।

 

जब भी पीछे मुड़कर देखती हूँ तो अपनी तुलना उस विरही नारी से करती हूँ जो अपने प्रिय के पाती के इंतज़ार में डाकिये का राह देखती,उसी से प्रेम कर बैठती है ठीक वैसे ही मैं भी आदित्य को तो ना पा सकी पर हिंदी के चाशनी में ऐसे गहरे डूबती गई मानो सदा से यही मेरी इष्ट रही हो!

 

आज मैं जो कुछ भी बन पाई हूँ, इसका शत-प्रतिशत श्रेय आदित्य को ही जाता है। ना उस रोज़ उन्होंने उपन्यास पढ़ाया होता और ना साहित्य-प्रेम जागता और नाहीं मेरा साहित्यिक सफर शुरू होता। एक अनाड़ी,नटखट व चुलबुली लड़की में हिंदी सहित्य के प्रति रुझान जगाकर एक गंभीर लेखिका बनाने में उनका अनोखा योगदान है।

आपका हार्दिक आभार आदित्य!

 

आर्या झा

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