मानसिक आघात से उभारते स्नेहिल रिश्ते

स्मिता आज मैं खाना अगर बाहर खा लूँ तो तुम मुझे घर तो आने दोगी ना !

अच्छा जी , वो तो मैं जानती ही हूँ, दोस्तों के बीच में बीवी की याद तो नहीं आ रही होगी , लेकिन नौटंकी करना नहीं छोड़ोगे तुम| आज्ञा तो ऐसे मांग रहे हो जैसे मेरे बिना कुछ करते ही नहीं हो, जाओ जी करो ऐश, लेकिन सुनो थोड़ा जल्दी आ जाना |

जी सरकार|

प्यार भरी उलाहना देते हुए स्मिता ने फोन रख दिया| राहुल भी ना एकदम बच्चों के जैसा है, हर बात पूछने की क्या ज़रूरत है, क्या सोचते होंगे उसके दोस्त? सोचते सोचते स्मिता सारे घर की बत्तियां बंद करने लगी, तभी किसी के ज़ोर ज़ोर से दरवाज़ा पीटने की आवाज़ आई |

ये कौन है जो इस तरह दरवाज़ा पीट रहा है ? उसने आगे बढ़कर दरवाज़ा खोला|

जी नमस्कार मुझे स्मिता शर्मा जी से मिलना था |

जी कहिए, मैं ही हूँ स्मिता शर्मा, आप कौन ?

मैं रमेश, दीनदयाल बाल आश्रम से आया हूँ | बड़े बाबू ने मुझे भेजा है, वो चाहते हैं कि आप अभी आश्रम आ जाएं, बहुत ज़रूरी है |

इस वक़्त! रात के ९ बज रहे हैं और राहुल भी घर पर नहीं हैं, कमल जी से कहियेगा मैं कल तड़के ही आ जाउंगी |

मैडम आपका अभी चलना बहुत ज़रूरी है, आपका फोन नहीं लग रहा था, इसीलिए बड़े बाबू मुझे खुद भेजा |

अच्छा ठीक है आप चलिए मैं अभी आती हूँ |

इतना कह कर उसने अंदर जाकर अपनी गाडी की चाभी ली और घर बंद कर के चल पड़ी, रास्ते में उसने राहुल को फोन कर सब कुछ बता दिया | आश्रम पहुंची तो देखा अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था, रमेश बाहर ही खड़ा उसका इंतज़ार कर रहा था |

आइए मैडम , इस तरफ | कहते हुए रमेश ने इशारा किया और आगे आगे चलने लगा, स्मिता जैसे ही उस कमरे के पास पहुंची तो उसने देखा कमल जी कमरे की बाहर चुपचाप खड़े हुए हैं और बेचैनी से बार बार अंदर झाँक झाँक कर देख रहे हैं|

अरे कमल जी! आप यहाँ क्यों खड़े हैं और ईएसआई क्या बात हो गई जो आपने मुझे इस समय बुलवा भेजा ?

अच्छा हुआ स्मिता तुम आ गईं , इस वक़्त बुलाने क एली क्षमा करो लेकिन बात बहुत ज़रूरी थी | वो देखो अंदर उस कमरे में…

स्मिता ने अंदर झाँका तो अँधेरे कोने में बैठी डरी सहमी सी एक लड़की दिखाई दी | कपड़ों से तो किसी अच्छे घर की लग रही थी, बाल बिखरे हुए थे, हाथ और पैर में चोट के निशान साफ़ दिख रहे थे, बड़ी बड़ी आँखें डरी हुईं थीं |

ये कौन है कमल जी ?

पता नहीं, हमें ये आश्रम के बाहर मिली, शायद कोई इसे यहाँ छोड़ गया होगा | नाम पता कुछ नहीं बता रही हमने बहुत कोशिश की लेकिन वो तो किसी को अपने पास भी नहीं आने दे रही है | तुम देखो शायद तुम कुछ मदद कर सको |

स्मिता धीरे से कमरे में गई और उसके बराबर ही नीचे बैठ गई, सहमी हुई उन आँखों में जैसे स्मिता को अपना पूरा बचपन दिख रहा था | स्मिता ने दूर से ही उससे इशारों में बातें कर उसका भरोसा जीतने की कोशिश की, कुछ ही देर में वो उसके पास बैठी थी | उसने ध्यान से देखा कि उसके हाथ और पैर में कई ज़ख्म हो रखे थे, जैसे किसी ने उसे बहुत बेदर्दी से मारा हो | कुछ ज़ख्म पुराने हो चले थे तो कुछ अभी भी ताज़ा थे, उसने कमल जी से इशारों में दवा मंगवाई |

स्मिता ने दवाई उस के ज़ख्मों पर लगाई वो जोर से चीख पड़ी और रोने लगी , उसे इस तरह रोता देख स्मिता ने झट से उसे अपने गले लगा लिया| स्मिता के गले लग वो और ज़ोर ज़ोर से रोने लगी, रोते हुए जाने कब उसकी आँख लग गई, धीरे से उसे बिस्तर पर सुला कर स्मिता घर आ गई |

सारी रात वो उस लड़की के बार में सोचती रही, सुबह सुबह कमल जी का फोन आया कि उस लड़की ने अपने आपको कमरे में बंद कर लिया है और किसी के भी बोलने पर दरवाज़ा नहीं खोल रही, राहुल को सारी बात बता कर वो आश्रम चली गई| उसकी आवाज़ सुन लड़की ने दरवाज़ा खोल दिया और उसके गले लग कर रोने लगी, अब धीरे धीरे स्मिता ने उससे बातें कर उसका नाम जानने की कोशिश की, उसके कुछ ना कहने पर स्मिता ने कहा “जब तक तुम अपना नाम नहीं बताती तब तक हम तुम हमारे लिए गुड़िया, चलेगा ना !” उसने फिर कुछ नहीं कहा |

स्मिता ने उसके बाल बनाए, कपड़े ठीक किए और अपने हाथ से खाना खिलाकर उसके ज़ख्मों पर दवाई लगाने लगी| “गुड़िया चिल्लाना नहीं हाँ, बस थोड़ा सा जलेगा |” गुड़िया ने धीरे से हाँ में सर हिला दिया | अब स्मिता रोज़ आश्रम आती और गुड़िया के साथ समय बिताती, किसी दिन अगर उसे ज़रा भी देर हो जाती तो गुड़िया सारा आश्रम सर पर उठा लेती | उसे स्मिता के अलावा और कसी पर भरोसा नहीं था, वो किसी को अपने पास फटकने भी नहीं देती थी|

समय के साथ वो स्मिता के साथ खुलती जा रही थी, स्मिता उसे रोज़ नई कहानियाँ सुनाती, गुड़िया के लिए नए कपड़े लाती, कभी उसके पसंद का खाना खुद बना कर लाती | उसने बहुत कोशिश की कि गुड़िया कभी उससे बात करे, लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगती| एक दिन जाने कहाँ से गुड़िया के हाथ अखबार लग गया, और उसमें आई किसी कि तस्वीर देखते ही गुड़िया की मानसिक हालत बिगड़ने लगी | वो ज़ोरों से चिल्लाने लगी, पता चलते ही स्मिता आश्रम पहुंची और स्थिति को संभाला | कुछ समय बाद काफी ढूढने के बाद पता चला कि वो जिसकी तस्वीर ने गुड़िया को इतना डरा दिया था वो उसके चाचा की थी जो शहर के जाने माने डॉक्टर थे | गुड़िया का असली नाम मिली था, दस साल की मिली के माता पिता का निधन हो चुका था और वो अपने चाचा चाची के साथ रहती थी | आखिर ऐसा क्या हुआ कि मिली इतना बड़े परिवार से होते हुए भी आश्रम में थी ? चाचा चाची से पूछने पर वो हमेशा सवाल टाल देते, उन्होंने तो कभी इस बात की सुध भी नहीं ली थी कि वो मिली कहाँ है और कहाँ नहीं |

स्मिता अब सच समझ चुकी थी, वो जान चुकी थी कि उस घर में मिली की कोई ज़रुरत नहीं है और मिली की इस हालत के ज़िम्मेदार कोई और नहीं बल्कि उसके रिश्तेदार ही हैं | उसने फैसला किया कि अब मिली से कोई सवाल नहीं किया जायेगा, कमल जी ने भी उसकी इस बात में सहमति जताई| मिली अब आश्रम में ही रह रही थी, आश्रम के लोगों के साथ और स्मिता के स्नेह से अब उसकी मानसिक स्थिति भी संभलने लगी थी|

समय बीत रहा था और बीतते समय के साथ मिली भी बदल रही थी, १६ साल की मिली को जब स्कूल में सबसे बड़े अवार्ड से सम्मानित किया गया तो उसने कहा – “मां ये आपके लिए, प्लीज़ स्टेज पर आइए और इसे स्वीकार करिए|” सबकी निगाहें उस ओर मुड़ गईं जहाँ से मिली की मां यानी स्मिता आ रही थी |

स्मिता द्वारा मिले प्यार, स्नेह और विश्वास ने मिलकर आज मिली को उसके अपनों के द्वारा मिले मानसिक आघात से बाहर निकाल आत्मविश्वास से परिपूर्ण व्यक्तित्व दिया था |

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