‘मां’ सी

एक तो मोमिता मासी, मेरी काम वाली बाई चार दिन की छुट्टी पे थी दो दिन ऊपर भी निकल गये थे उस पर मेरी तबियत कहर बरपाये थी,       अस्त व्यस्त कमरा किचेन सब कुछ मेरी बीमारी को जबरदस्त तरीके से बढ़ाये हुये था| ऑफिस से छुट्टी लेना मजबूरी थी वरना कौन अकेले कमरे में पड़े बीमारी को सहेजना चाहता है, उस पर भी बॉस का ताना ” भई रमेश बुखार सिरदर्द तो लड़कियों वाले बहाने हैं छुट्टी लेने के तुम लड़कों को ये बहाने शोभा नहीं देते” अब कौन बताये साहब को कि जो काम हाथी नहीं कर सकता वो चीटीं कर जाती है, मेरा शरीर ज्वालामुखी हो रहा था और पलक झपकाने में भी खोपड़ी बाहर निकलने जैसा दर्द था, शायद जिंदगी में पहली बार ऐसा भयंकर रूप देखा था सरदर्द का| दवाईयां भी कमबख्त असर नहीं कर रहीं थी

सुबह मोमिता मासी का फोन आ गया ” रोमेश बाबू अमारा कोलकाता में बोहुत बारिश हो रहा है ना तो ट्रेन कैंसिल हो गया आज, में कल दिल्ली नहीं पहुंच पायेगा” सुन कर दिमाग खराब हो गया मेरा| मैं गुस्से में बिफर पड़ा “एक काम करो मैडम अब सीधा हिसाब करना आकर| बहुत हो गया आपका नाटक अकेला लड़का समझ कर मनमर्जी की आदत लग जाती है तुम बाईयों को “ऐसा क्यूं बोलता है बाबू आमी..” मैंने बिना उसकी पूरी बात सुने फोन एकतरफ पटक दिया, गुस्से में मुझे होश ही नहीं था कि सामने मुझसे दोगुनी उम्र की गरीब महिला है|

अगले दिन शाम को दरवाजे पे दस्तक हुई,आधी बेहोशी में ही लड़खड़ाते हुये मैंने दरवाजा खोला, मैं बस इतना ही देख पाया कि सामने मोमिता मासी थीं, आंखों के सामने अंधेरा छाया और मैं दरवाजे पर झूल गया, थोड़ी देर मैं सुन्न हालत में था, थोड़ा होश आया तो मोमिता दीदी मेरे सामने पानी का गिलास लिये ना जाने क्या बड़बड़ाये जा रही थीं, ” बाबू…. तुमको को तो बोहुत ज्वोर आया है….. तुम बच्चा लोग साेब भीषण लापरवाह होता है , पहले बोलता तो आमी चला आता ना , शुधुई राग कोरता है बोलताई नही किच्छू”

मुझे मोमिता मासी की हिंदी बंगाली कुछ समझ नहीं आ रही थी, पता नहीं कैसे वो मुझे सहारा देकर बेड तक ले गयीं| चेहरे पर पानी की बूंदे महसूस हुई तो मैं नींद नुमा बेहोशी से जागा, मौमिता मासी मेरे माथे पे ना जाने कब से गीले कपड़े की पट्टियां रख रही थीं, मेरी आंख खुलते ही वो हाथ पोंछते हुये रसोई की ओर तेज कदमों से गयीं और कुछ देर में चाय लेकर आयीं, अजीब सी दिखने वाली चाय का घूंट भरते ही मेरी त्यौरियां चढ़ गयीं, “कुछ नहीं बोलेगा तुम, काढ़ा है ये काढ़ा, तुमको सोर्दी लगा है बोहुत तेज, शॉन्ति से पियो, आमी बोलबो” इससे पहले मैं कुछ बोलता मोमिता मासी ने गेंद अपने पाले में ले ली और बिल्कुल मां की तरह डांट कर आदेश दे डाला, पता नहीं एक कामवाली बाई की डांट में क्या जादू था कि मैं चुपचाप छोटे बच्चे की तरह सुड़क सुड़क कर वो कड़वा सा काढ़ा बड़े प्यार से पीने लगा, मासी ने साड़ी का पल्लू कमर में खोंस मोर्चा सम्हाला “तुम लरका लोग बोहुत केयरलेस होता है, ना खुद को सम्हाल पाता ना घर, पता नहीं ऑफिस में कैसे काम कोरता है, शादी क्यों नहीं कर लेता तुम, घर में बीवी आयेगा तो ऐसा ऐक्ला बेहोशी में तो नहीं पड़ा रहेगा ना” सामान समेटते हुये मौमिता मासी बड़बड़ाये जा रही थीं, सिरदर्द में जहां  मुझे अपनी सांसें भी शोर मचाती हुई लग रही थीं मैं मासी की अनवरत बड़बड़ बड़े ध्यान से सुन रहा था, ” अभी तो ये माथे पर पट्टियां रख रही थी और अब देखो इन्हें, मां भी तो बिल्कुल ऐसे ही करती थी ना, एक हाथ से पुचकार दूसरे हाथ में डंडा हमेशा तैैैैयार, लाड़ करते करते डांटना, डांटते डांटते लाड़ करना” मन ही मन सोच कर मुझे हंसी आ गयी,

“आपकी ट्रेन तो केंसिल हो गयी थी फिर आज इस टाईम कैसे?” मैंने बातचीत का रूख मोड़ने की कोशिश की|

“हां ….” मौमिता मासी की रफ्तार पे अचानक ब्रेक सा लगा, “वो क्या है ना रोमेश बाबू, आप से बात होने के बाद आमी बस से निकल आया कल” बड़ी सकुचाई सी आवाज में मौमिता दीदी झाड़ू लगाते हुये बोली तो मुझे अपनी पिछले दिन की बत्तमीजी पे बहुत शर्म महसूस हुई, कम्बल को मैंने मुंह तक ले लिया|

मौमिता मासी दलिया बना कर लायीं, मैंने मुंह बिजका कर दलिया को घूरा फिर मासी को, “तो क्या बोर्गोर खायेगा अभी? दलिया खायेगा तो जल्दी अच्छा हो जायेगा ना” मासी ने फिर से झिड़की दी|

“बोर्गोर” मोमिता मासी की हिंदी बंगाली की मिलीभगत पर मैं हमेशा की तरह हंस पड़ा, हालांकि हंसने पर भी सर टनटना गया मगर पता नहीं क्यूं जब से मासी घर में दाखिल हुई थीं, मैं और मेरा कमरा दोनों थोड़े जिंदा से लगने लगे थे,

“अच्छा मासी आपको कैसे पता कि मुझे सर्दी लगी है”

“तुम जानी ना हम मां लोग भी थोरा थोरा डॉक्टर होता है” मासी ने आंखें मटकाते हुये खुद की तारीफ करने के हाव भाव में बोला और खिलखिला कर खुद ही हंसने लगी|

“मां ” ये शब्द ही अपने आप में बीमारियों के लिये रामबाण है | शायद तीमारदारी करते वक्त हर औरत में एक मां जीवित हो जाती है या शायद औरत के भीतर मां का रूप कभी मरता ही नहीं है, मेरी अपनी मां तो इस दुनिया में नहीं थी लेकिन अभी मुझे अपनी कामवाली बाई  में वही निर्मल छवि नजर आ रही थी क्यूंकि पगार तो सिर्फ काम की मिलती है उन्हें इस अपनेपन, फिक्र और दुलार की नहीं|

मुझे दवाई खिला कर, गुनगुना पानी, बाकी दवाईयां मेरे सिरहाने रख,  मासी जाने को हुई, दरवाजे तक पहुंच जैसे उन्हें कुछ याद आया “रोमेश बाबू जब तक तुम अच्छा नहीं हो जाता आमी आता रहेगा फिर तुम चाहो तो हिसाब कोर देना” मासी को वो बात याद थी उनकी सधी हुई आवाज बता रही थी कि उन्हें बुरा भी लगा था,

मैं शर्मिंदगी से गढ़ा जा रहा था ,सॉरी थैंक्यू जैसी बातें बेमानी सी लग रहीं थी “मासी मैं ठीक हो जाऊंगा ना तब तुम्हें  भी ‘बोर्गोर’ खिलाऊंगा” मैं मासी को चिढ़ाने के अंदाज में बोला|

“धत् शैतान मासी के साथ मॉस्ती कोरता है, चलता है ,सुबह में आयेगा” मासी हंसते हुये चली गयीं|

बड़े दिनों बाद मुझे उस रात गहरी नींद आयी, ऐसा लगा जैसे पूरी रात मां मासी के रूप में मेरे सिरहाने बैठी मेरा सर सहलाती रही|

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