भैया मेरी राखी का मान।

बार आता है ये राखी का त्यौहार ,जब जो मांगा तुमसे दिया तुमने हर बार लेकिन इस बार मांगूंगी सिर्फ एक उपहार, अगर करना है ,तुम्हे मेरी राखी का मान तो देना तुम हमेशा मेरी भाभी को सम्मान। तुम्हारे लिए वो अपना घर छोड़ कर आएगी ,वो यहां आकर अपना घर सजायेगी। जैसे मैं उस घर में चहकती थी ,वैसे ही उसको तुम चहकने देना, जैसे मैं तुम सबके संग हंसते हुए रहती थी उसको भी वैसे ही हंसने देना।मैं जैसे माँ पापा संग बिन घूंघट के रहती थी, उसको भी तुम सबके संग बिन पर्दे के रहने देना।मेरी हर ख्वाइश पूरी करते थे मुझे किसी बन्धन में न रखते थे ,उसको भी तुम हर बन्धन से आजाद रखना।

मैंने माँ को भी बतलाया है तुम भी माँ को समझा देना की जैसे मैं उस घर के बेटी हूं वैसे अब वो मेरी माँ की ही बेटी है।भैया तुम उसके परिवार को उतना ही सम्मान देना जैसे तुम अपने घरवालों को देते हो ,अब तुम एक नहीं दो घर के बेटे हो।तुमने मुझे भी ब्याह कर मेरे ससुराल भेजा ही ,अब हर बात को मैं भलीभांति समझती हूं । जब मेरी भाभी मेरे मायके में मुस्कुराएगी ,तभी मेरे कलेजे को ठंडक आएगी। भैया तुमसे हर राखी पर अब मांगती हूँ यही उपहार , देना है अगर तुम्हें मुझे अब कोई उपहार तो रखना हमेशा भाभी संग अच्छा व्हवहार , भैया मेरी राखी का मान करना |

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