भेदभाव – लड़के- लड़की का या सोच और समझ का?

ये कोई समय है घर आने का? रात के 11 बज रहे हैं, कहाँ से आ रही हो अय्याशी करके ? घर के अंदर कदम रखते ही पापा की तेज़ आवाज़ कानों में गूंजी। ये बात तब कि है, जब मैं कॉर्पोरेट सेक्टर में नौकरी करती थी। हमारी टीम के उम्दा प्रदर्शन के लिए ऑफिस कि तरफ से एक दावत का आयोजन किया गया था। वैसे तो मैं पापा कि ऐसी ना जाने कितनी डांट खा चुकी थी, लेकिन उस दिन उनके वो शब्द कानों में सुई कि तरह चुभ रहे थे । अय्याशी !!! एक दिन अगर थोड़ी देर से आई तो आपने ऐसे कैसे मुझसे कह दिया कि मैं अय्याशी करके आई हूँ? ऐसा मैंने क्या कर दिया कि आप मुझसे इस तरह बात कर रहे हैं ? माना कि मैं बेटी हूँ, पर मेरी अपनी भी कुछ ख्वाहिशें हैं, और उन्हें पूरा करने के लिए मैं उतनी ही आज़ाद हूँ जितना कि भैया या कोई भी और लड़का।

मुझे इस तरह आपा खोता देख पापा शांत हुए और एक नए सिरे से समझाना शुरू किया । बेटा तुम लड़की हो, कल को कुछ ऊंच नीच हो गई तो ? तुम्हें पता है हम तुमसे कितना प्यार करते हैं और भी ना जाने क्या क्या । कुल मिला के पापा ने वही सब बातें दोहराईं जो हम ना जाने कब से सुनते आ रहे हैं । इन सब बातों में मुझे जो शब्द सबसे ज़्यादा खटका, वो था “बेटा” । अगर बेटा कहते हैं, तो मानने में गुरेज कैसा ?

हमारे समाज में लड़के लड़की में इतना भेदभाव क्यों ? एक ही मॉ कि कोख से जन्मे हाड़ मांस के बने हुए हम, फिर भी सिर्फ शारीरिक संरचना के आधार पर एक को श्रेष्ठ और दूसरे को कम आंका जाता है। लोग अक्सर ये भूल जाते हैं, कि आदमी अगर शारीरिक तौर पर मज़बूत है, तो औरतों को भगवान ने जज़्बाती मज़बूती दी है। सौ पुरुष मिलकर भी, एक औरत के विश्वास, उसके चरित्र, धैर्य, समर्पण, त्याग का मोल नहीं चुका सकते।

मेरी किस्मत अच्छी थी, जो मुझे ऐसे माता पिता और ऐसा परिवार मिला जहाँ हमेशा सच के लिए खड़े होने और बोलने की पूरी आज़ादी थी, शायद इसीलिए मैं उस दिन इस बात को पापा को समझा पाई। वरना तो अकसर हमे समझाईश दी जाती है, कभी हमारे कपड़ों को लेकर, कभी दोस्तों को लेकर। यहाँ तक कि, कब, कहाँ, किसके साथ, कितनी देर के लिए जाना है ? सब हमारे लिए दूसरे तय करते हैं। ये भी शायद कम ही पड़ जाता है लोगों को, जो खाने‌‌ ‌‌– पीने कि सलाह भी अब हमारे लिए मुफ्त में बंटने लगीं हैं । अरे बेटी ये मत खाओ मोटी हो जाओगी, अब तुम बड़ी हो रही हो अगर ये खाना इसी तरह खातीं रही तो पीरियड्स जल्दी हो जायेंगे।

ये शेक तो भाई के लिए है, वो दिनभर पढ़ाई करके थक जाता है, तो मैं!!! मैं नहीं करती क्या कोई काम? सुबह रसोई में हाथ बंटाना, फिर कॉलेज के लिए भागना, वापस आकर फिर घर के कामों में हाथ बंटाना, अपनी पढ़ाई करना, पापा को ऑफिस के काम में मदद करना, ये सब काम नहीं होते क्या? उफ्फ, ना जाने क्या क्या नहीं होता लड़कियों के साथ, और वो भी अपने खुद के घर में, अपने खुद के परिवार वालों के हाथों। हमसे कहा जाता है, इस तरह के कपड़े पहनोगी तो लोग तो बुरी नज़र डालेंगे ही, रेप तो होगा ही, और ये बात जब कोई पढ़ा लिखा, खुद को विद्वान समझने वाला व्यक्ति करता है, तो उसकी सोच का दायरा बस हमारे शरीर तक ही सीमित रहता है।

एक बात जो मेरे समझ के परे है वो ये कि, बुरके में ढंकी औरत का बलात्कार तो होना ही नहीं चाहिए और छोटी छोटी बच्चियों के साथ भी ये हैवानियत नहीं होनी चहिये। लेकिन ये सब होता है, क्यों? क्योंकि हमने सब कुछ बस अपनी बेटियों को ही सिखाया और बेटों से कहा कि जाओ बेटा जाकर दुनिया जीत लो, और इस जीत के रास्ते में अगर किसी को कुचल के भी आगे बढ़ना पड़े तो बढ़ जाना, कोई तुम्हें रोकने वाला नहीं है। लेकिन अब बेचारे बेटे भी क्या करें, उनकी भी क्या गलती, जो उन्होंने घर में देखा, वही बाहर किया। रोज़ माँ के मर्ज़ी के खिलाफ पिता का सेक्स करना, बहन को हर जगह कमतर साबित किया जाना, यही सब देख कर वो बड़ा हुआ है, दादी कि गालियां खाकर भी माँ का मुस्कुराते रहना। फिर इसी तरह के व्यव्हार को उसने अपनी दुनिया बना लिया।

तो अब अगर आप आने वाली पीढ़ी को एक स्वस्थ और सुरक्षित जीवन देना चाहते हैं तो उन्हें लड़का लड़की में नहीं, वरन् सही गलत में भेद करना सिखायें, उन्हें स्वस्थ शरीर के साथ साथ एक स्वस्थ सोच की भी ज़रूरत है, जो उन्हें जीवन के हर पड़ाव में सफल बनने में मदद करेगी।

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