भीड़ का चेहरा

भीड़ का चेहरा

एक आदमी रास्ते में जल्दी-जल्दी में जा रहा थ।। तभी सामने से एक आदमी हाथ में सब्जी का थैला उठाए आ रहा था ।उन दोंनो की टक्कर हुई और सब्जी का थैला उठाया हुआ आदमी गिर गया। सब्जी भी सारी रास्ते में बिखर गयी।
पहले आदमी ने उस गिरे हुए आदमी को हाथ देकर उठाते हुए कहा, सॉरी भाई साहब ! गलती हो गई ।
लेकिन वह गिरने वाला आदमी बहुत गुस्से में था। बोला ,”सॉरी सॉरी, क्या सॉरी -सॉरी ? मेरे सारे कपड़े गंदे हो गए, तुम्हें सॉरी की पड़ी है, और इन सब्जी का क्या?? यह टमाटर तो सारे खराब हो गए! अब इनको सॉरी बोलो!!
देख कर नहीं चल सकते।”
“भाई साहब! टमाटर के लिए सॉरी।” नहीं-नहीं! “माफी” माफी मांगता हूं!
क्या माफी, माफी,,,,,, अब मेरी पत्नी क्या बनाएगी ?
वैसे ही ऑफिस में देर हो गई। शाम से पत्नी ने फोन कर -कर के सब्जी के लिए दिमाग खराब कर के रखा हुआ है
उनका झगड़ा देखकर वहां कुछ लोग आने लगे और खड़े हो गए । ( शायद मजे लेने के लिए)

“”कुछ लोग तो इतने फालतू होते हैं कि उन्हें पता नहीं होता कि वह सड़क पर क्यों है””

पहला आदमी बोला- भाई साहब यह लीजिए ₹200, फिर से सब्जी ले लीजिए। मुझे जरा जल्दी घर जाना है, मेरी पत्नी को हॉस्पिटल…….तभी भीड़ में से एक आदमी ने उसका काॅलर पकड़ते हुए कहा !
क्या ₹200?,,,,,,, ज्यादा पैसा का रोब ना दिखाओ ,,आपको यह कोई भिखारी नजर आते हैं! अच्छे कमाते हुए घर के लग रहे हैं।
“म्मममममेरा वह मतलब नहीं था ,,अब आप बताइए इनके गिरने के दुख में मैं इनकी क्या सेवा कर सकता हूं ?”

“सेवा सेवा !!क्या सेवा ??तुम क्या सेवा करोगे ?मैं कोई बूढ़ा आदमी हूं मैं तो पूरी तरह से जवान हूं। मैं दस की सेवा कर सकता हूं।”
“तो भाई साहब! मैं निकलता हूं। मझे अपनी पत्नी को …………”
“ठीक है तुम निकलो, मैं अपना देख लूंगा।” ऐसा कहकर गिरी हुई सब्जी उठाकर अपना थैला पकड़ कर निकलने लगता है।
दूसरा व्यक्ति भी जैसे ही चलने लगता है कि,,,,
तभी भीड़ में से किसी ने उसका हाथ पकड़ लिया, और कहा ! “ऐसे कैसे जाओगे ? पहले पूरा हिसाब करो,”

“कैसा हिसाब ? मैंने क्या किया है? मुझे जाने दीजिए ! मेरा घर पहुंचना बहुत जरूरी है, मेरी पत्नी……..”
वह पूरा बोल भी नहीं पाया था कि,,,,,, भीड़ में से एक आदमी बोला !
“क्या नहीं किया? एक आदमी को धक्का देकर गिरा दिया। सारा सामान खराब हो गया । और खाली पीली निकल रहे हो।
” लो भैया! यह ₹200 रख लो ,!
भीड़ मैं से कोई बोला! ” 200नहीं ₹2000दो कोई भिखारी थोड़े ही है “।
कुछ लोग भीड़ में से अपना कैमरा निकालकर नजारे के मजे ले रहे थे। तो कुछ सिर्फ तमाशबीन की तरह खड़े तमाशा देख रहे थे ।
“मेरे पास हजार रुपए भी नहीं है ”
भीड़ मैं से आवाज आई!!! इसकी जेब देखो ,,,,
कोई बोला ! इसका मोबाइल छीन लो,,,,
कोई बोला! इसका चश्मा ले लो,,,
कोई बोला ! इसका पर्स ले लो

और भीड़ की धक्का-मुक्की में वह आदमी बुरी तरह जख्मी हो गया । भीड़ में से दो चार जीवन से परेशान लोगों ने अपनी भड़ास निकालने के लिए तो उसे दो चार घू़ंसे और लात भी जमा दिए ।

“””ऐसे मामलों में भीड़ का अपना कोई मस्तिष्क नहीं होता वह मानसिक रूप से कमजोर लोगों का एक झुंड बन कर रह जाती है”””

बेचारा आदमी (बिना किसी वजह गलती के) जमीन पर गिर पड़ा। सर से खून बह रहा था। कपड़े फट चुके थे। भीड़ उसका सारा सामान लेकर जा चुकी थी।

“””वहाँ लड़ने वाला कोई स्पष्ट चेहरा नहीं था। सिर्फ कुछ बुरे से दिखने वाले लोगों की धुंधली- धुंधली सी तस्वीरें थी। “””

शायद उसका घर जाना बेहद जरूरी था ।लेकिन वह उठ भी नहीं पा रहा था। उसकी तरफ से लड़ने वाला वहाँ कोई नहीं था। वह अकेला हताश निराश जमीन पर पड़ा हुआ आते जाते लोगों को बस देख रहा था।।।।।

स्वरचित व मौलिक
हीतू सिंगला

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