बिछुये

माहौल में खुशी और गम दोनों की रंगत थी आखिर बेटी की विदाई का पल ही कुछ ऐसा होता है। माँ चकरघिन्नी बनी हुई थी। ये लाओ, उसे रखो,… इन सब के बीच घूमती माँ ने एक नजर दुल्हन बनी अपनी छोटी बेटी रानी पर डाली तो बरबस आंसू बह पड़े। तभी बड़ी बेटी राधिका मां के पास आकर दर्द से कराहती हुई बोली ” माँ देखो ना ये बिछुये चुभ रहे हैं, चल भी नहीं पा रही” रानी की विदाई का सामान पैक करती माँ को सांस लेने तक की फुर्सत नहीं थी, “जा जाकर कड़वा तेल लगा ले, क्या जरूरत थी नये बिछुये पहनने की, अभी मुझे तो बिल्कुल फुर्सत नहीं है”, अपना काम करते करते हुए मां ने कहा। राधिका भी लंगड़ाते हुये वहां से चुपचाप चली गयी।

जैसे- जैसे बेटी की विदाई का पल करीब आने लगा मां के हाथ पांव फूलने लगे, दिल की धड़कन अचानक थमती और अगले ही पल तेजी से दौड़ने लगती। रिश्तेदार समझा रहे थे, “बड़ी किस्मत वाली हो तुम जो इतनी जल्दी दोनों बेटियों के हाथ पीले करके गंगा नहा ली, वरना आज के जमाने में बेटियों को इतनी आसानी से अच्छे घर कहां मिल पाते हैं”!

“हां अच्छे घर; यही सुकून की बात है, दोंनों बेटियां अच्छे घरों में है, इससे ज्यादा और क्या चाहिये” यही सोचकर मां ने राहत की सांस ली और पानी का गिलास उठाया।

तभी राधिका फिर से आयी “मां!….” राधिका ने धीरे से आवाज लगायी।

“तू यहां क्या करने आ जाती है बार- बार, अपनी बहन के पास जाकर बैठ ना, उसे कोई जरूरी बात कहनी हुई तो किससे कहेगी?”

मां ने समझाते हुये कहा। “मां मेरी भी विदाई की तैयारी कर दो, अभी मुझे भी निकलना है”! “तू कहाँ जा रही है?” मां ने हैरानी से पूछा।

“मां…. ये (राधिका का पति) जिद कर रहे हैं इनके साथ ही ससुराल चलने के लिये”!

अरे…! ऐसे कैसे जिद करे हैं, इतनी जल्दी कैसे जा सकते हैं दामाद जी, तू रूक मैं बात करती हूं उनसे” फलों की डलिया वहीं पटक मेहमानों की भीड़ चीरते हुये मां बाहर निकल गयीं|

“नहीं… आप नहीं मां…. रुको…” पीछे से राधिका चिल्लाती रह गयी लेकिन मां सीधे अपने दामाद के पास पहुंच गयीं|

“दामाद जी! ये क्या सुन रही हूं मैं? आप लोग अभी से जा रहे हैं?”

“जाना होगा मां जी घर से फोन आ रहा है” दामाद जी बोले|”अभी रानी की विदाई होने दो बेटा, आप लोग तो घर के हैं आराम से विदा कर दूंगी, वैसे भी एक बेटी की विदाई में छाती फट रही है दोनों बेटियां एक साथ चली गयीं तो मैं इस घर में मर ही जाऊंगी” रूंधे गले से जैसे तैसे आवाज निकल पायी मां की|”

हम्म…” दामाद जी कुछ सोचते हुये बोले “राधिका चाहे तो यहां रूक जाये लेकिन मुझे तो अभी जाना है। मेरे पापा जी को ज्यादा भीड़ बर्दाश्त नहीं होती वो और ज्यादा यहां रुके तो बीमार पड़ जायेंगे”। एक चालाक व्यापारी की तरह दामाद जी ने अपनी बात मां को समझा दी।

दामाद जी की जिद और तर्क के आगे उन्होंने हार मान ली| मगर राधिका के रुकने भर से मन ने राहत की सांस लेकर दामाद को हजारों दुआयें दे डाली।

“तू भी ना राधिका फालतू में हल्ला करती है, कितना भला लड़का मिला है तुझे| मेरे कहे बिना ही तुझे रुकने को कह दिया उन्होंने, ऐसा दामाद भगवान सबको दे”।

राधिका का चेहरा देखे बिना मां कहकर चली गयी| खुशी और गम के बीच रानी गाड़ी मैं बैठ कर विदा हो गयी, बेटी की विदाई में दुश्मन भी पिघल जाये मां तो बेसुध सी हो गयीं। इधर राधिका भी अपना सामान लेकर तैयार खड़ी थी। मां कुछ समझ ही नहीं पा रही थी। दामाद जी भी अपने पापा के साथ गाड़ी में बैठ चुके थे।

” तू कहां चली बिटिया? और ये घूंघट क्यों डाला हुआ है?” मां ने पूछा तो राधिका मां के गले लग गयी “ससुर जी हैं ना साथ इसलिये घूंघट ले लिया। मुझे जाने दो मां”… राधिका की आवाज भर्रा गयी। वह झट से मां से अलग हुई बाकी मेहमानों से विदा ली और बाहर जाने लगी। मां को घबराहट हो रही थी, शरीर तो थक ही चुका था अब दिमाग भी सुन्न पड़ चुका था। आखिर में रहा नहीं गया तो जाकर राधिका के गले लग गयी, “मां से क्यूं घूंघट कर रही है पागल एक बार अपनी बेटी का चेहरा तो देख लेने दे” एक झटके से मां ने घूंघट खींच दिया, राधिका ने छटपटाकर घूंघट पकड़ना चाहा मगर पकड़ ना सकी| एक पल को मां की आंखों के सामने अंधेरा छा गया| नीली पड़ी आंख की कोर, होंठ के नीचे रिसता हुआ खून, गाल पर पांचों उंगलियों की नीली छाप सारी कहानी बयां कर गये थे, मेहमानों की नजर पड़े उससे पहले मां ने खुद ही घूंघट वापस डाल दिया| दामाद हॉर्न पे हॉर्न बजाये जा रहा था। राधिका बाहर निकलने को हुई तो मां ने लड़कों को राधिका का सामान वापस अंदर लाने को कहा और राधिका का हाथ पकड़ कर वापस लौटने लगी।

“ऐसा मत करो मां…. प्लीज जाने दो.. आपको मेरी कसम…”  राधिका गिड़गिड़ाने लगी।

“तेरी कसम का मान रखने से कौन सा तू जिंदा रहने वाली है” मां ने गुस्से से उसे घूरते हुये कहा “अब एक शब्द और मत कहना तू”|

“इंसान मरने के बाद ही गंगा नहाता है बेटियों की शादी करके नहीं” मां ने आंगन में जोर से कहा और राधिका को उसके कमरे में ले जाकर मां बेटी ने एक दूसरे के सामने सारे दर्द उड़ेल दिये। जितनी बार मां राधिका का नीला पड़ा चेहरा देखती उनका खून खौल उठता। रात भर मां राधिका के सिरहाने बैठ सोचती रही “एक मां होकर मैं क्यों अपनी बेटी की आंखों में छिपा दर्द नहीं देख पायी, अनपढ़ हूं मगर इतनी भी नहीं कि  बेटी का मन ना पढ़ सकूं, हर बार मायके आने के नाम पे काम का बहाना करना, मायके आने पर भी चेहरे पर खुशी की जगह खौफ बना रहना, पति की बात आने पर बात घुमा देना, बेवजह चेहरे पर मेकअप की परतें चढ़ाते रहना…. क्यों कुछ नहीं समझ पायी, दो साल से दामाद को बेटा मानते ही बेटी का दर्द आंखों से ओझल कैसे हो जाने दिया, आज उस लड़के की इतनी हिम्मत बढ़ गयी कि मेरे ही घर में आकर मेरी बेटी पर…?”

“मां बिछुये चुभ रहे हैं” बेटी नींद में ही दर्द से कुनमुनाई। मां ने राधिका के पैरों को देखा, उंगलियां पानी में काम करते करते गल चुकी थीं, अचानक मां को ना जाने क्या सूझा, एक एक करके राधिका के सारे बिछुये उतार फेंके।

“ये क्या कर रही हो मां ? दर्द हो रहा है” अपने पैरों को खींच राधिका उठ कर बैठ गयी। राधिका के पैरों को गोद में रख मलहम लगाते हुये मां बोली “इसी दर्द से तुझे आजादी दिला रही हूं बेटा, अब ये बिछुये नहीं चुभने दूंगी तुझे”, राधिका को मां की बातें समझ नहीं आयीं मगर घाव पर मां की ममता का स्पर्श लगा तो दर्द में राहत जरूर मिली थी वह चुपचाप आंखें बंद कर वापस सो गयी |राधिका की बेपरवाह नींद इस चुभन से आजाद होने की निशानी थी|

मां अंधेरा छंटने के इंतजार में अब भी जाग रही थी बेटी की जिंदगी से भी और अपने आंगन से भी, अगली सुबह उन जमींन पे पड़े बिछुओं की चुभन का हिसाब लेना भी तो बाकी था।

दोस्तो दर्द अगर लगातार दबाया जाये तो एक दिन वह अंतहीन घाव बन जाता है| कई बार बेटियां परिस्थितिवश अपने साथ होने वाले दुर्व्यवहार को अपने मां बाप से छिपा लेती हैं तो कई बार मां बाप भी शादी करके इतिश्री करने में विश्वास रखते हैं ये दोनों ही परिस्थितियां बच्चों और मां बाप के लिये घातक हो सकते हैं, मेरा मानना है कि कम से कम मां से कुछ छिपाना नहीं चाहिये क्योंकि मां कितनी भी असहाय क्यों ना हो बच्चों के लिये उसमें दुनिया से लड़ने की हिम्मत हमेशा बाकी रहती है। इस विषय पर आप क्या कहते हैं??

धन्यवाद दोस्तो कहानी पसंद आये तो लाइक कीजिये, आपके विचारों का हमेशा स्वागत है|

आपकी प्रज्ञा तिवारी

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