बबलू का फोन

बबलू का फ़ोन

 

 

 

“भाभी बबलू का फ़ोन आया है!”

“अभी आई” मैं भाग कर फ़ोन तक पहुँची।

अरे! प्यासा ही कुंए के पास जाता है। कुंआ तो चलकर आयेगा नहीं। यहाँ कुंआ यानि एक काले रंग का उपकरण जो लोगों के संचार का माध्यम था जो अमूमन उन दिनों घर में शान का प्रतीक था। हर घर में एक ही होता था। घर के बड़े-बुजुर्गो की तरह ही लीविंग रुम में स्थापित रहता था। उसे भी कुछ वैसा ही सम्मान भी प्राप्त था। वो लंबी घंटी….टुर्र वाली कभी देश तो कभी विदेश वाली बजती रहती थी।पर अब ना तो विदेश का ही कोई महत्व रह गया है और ना हीं लैंडलाइन फोन का। आजकल महत्व है तो व्यक्ति विशेष का। हर हाथ में मोबाइल है। जिसमें आपने जरूरी फ़ोन ,गैर जरूरी फ़ोन लिख रखा है। अपनी मर्ज़ी व सुविधानुसार फ़ोन लिये जाते हैं। खैर बात तबकि है जब घरों में एक फ़ोन हुआ करते थे और वह भी कॉलर आईडी के बिना। यानि वो काला मशीन चिल्लाता रहेगा जब तक कोई उसकी गुहार ना सुन ले।भलाई इसी में है कि उठा कर सुन तो लो ताकि शांति मिले।

बस भाग कर उठाया। चूंकि मुझसे कहा गया था मतलब मेरे मायके का फ़ोन था। मायके का तो कौवा भी प्यारा लगता है फिर ये तो भाई था। बस एक ही सवाल ने ज़हन में बड़ा बवाल मचा रखा था कि ये कौन सा बबलू था,चचेरा या मौसेरा बबलू।

 

“कैसे हो बबलू” मैने अंदाजे पर बातों में शहद घोला।

“मस्त हूँ! अपनी कहो।”

“मैं भी ठीक हूँ, घर में सब कैसे?”

“सभी मज़े में…….!”

बात खत्म हुई तो फ़ोन रख दिया। फिर दो दिन बाद वही भाभी आपके बबलू भाई का फ़ोन है….समझ में नही आ रहा था कि कैसे पूछूं कि “भाई मेरे! आप कौन से वाले बबलू हैं?”

यहाँ सवाल बस मेरे मायके का नहीं बल्कि मम्मी-पापा के घरवालों का भी था। अगर मम्मी की तरफ वाले बबलू हुये तो समझेंगे बस अपने खानदान की होकर रह गयी और पिताजी की ओर वाले हुये तो और चिढ़ेंगे कि माँ ने अपने मायके की ओर झुका लिया। हम तो ठहरे न्यायप्रिय बंदे,भला किसी को कैसे दुखी कर दें। फिलहाल हमने मामला ज्यों का त्यों रखने में ही भलाई समझी। मेरा कुछ भी कहना किसी को भी तकलीफ पहुँचा सकता था। ब्याही बेटियों को कितना सोचना पड़ता है ना! भाई के बुरा मानने पर तो मना भी लें, पर बात बस भाई की नहीं थी बल्कि उनके माता-पिता की थी। जो यह कह सकते थे कि देखो शादी होकर बड़े शहर क्या गयीं ये तो हमें भूल ही गयीं! सौं बातें दिमाग में आने लगीं।

नहीं-नहीं! वह सबके लिये जैसी भोली-भाली थी वैसी ही रहेगी। ठीक है कि मैट्रो की लाइफ सब सीखा देती है। हम जैसे आते हैं वैसे तो बिल्कुल नहीं रह जाते पर क्या जरूरी है कि सारी तेज़ी घरवालों को ही दिखाई जाये। फिर सवाल मायका और उसकी इज़्ज़त का है। अपना भी एक भाव था ससुराल पर कि इसके मायके वाले खूब पूछते हैं। यह तो ना खराब करती। बस यही सब सोचकर हमने चुप्पी साध ली और ये फ़ोन का सिलसिला महीनों चलता रहा।

 

एक दिन दिमाग लगाया और पूछ ही लिया कि,

“कहाँ से बोल रहे हो बबलू?”

“हैदराबाद से”

“बस्ती से कब आये?”

“बस्ती?”

“मुझे लगा सामान डेलीवरी के लिये आते होगे?”

“नहीं तो ,मैं तो यहीं रहता हूँ!”

यह सुन कर ऐसा लगा जैसे ये बस्ती वाला नहीं बल्कि लखनऊ वाला भाई है। पर अगर यह मेरे ही शहर में रहने आया है तो कभी तो घर आता। ऐसे ही बहुत से ख्याल

दिल में आने लगे पर कहीं ना कहीं काम की व्यस्तता ने इस विषय से दिमाग हटा दिया था कि फिर से फ़ोन आया।

अब तक परेशान हो चुकी थी। अब ये सिलसिला दिमाग खराब कर रहा था। सोचा आर या पार,आज इसका फैसला करके रहूँगी।

“हाँ बबलू भाई! अरे फ़ोन पर ही बात करोगे या घर भी आओगे?”

“हम तो कब से इसी इंतज़ार में बैठे हैं कि तुम कब घर बुलाओ!”

“अरे तो पहले ही आ जाते। तुम्हारे जीजाजी को भी अच्छा लगता।”

“जीजाजी….ये कौन हैं?”

“मेरे पति…!”

“तुमने बताया ही नहीं कि तुम शादीशुदा हो!”

“ये कैसी पागलों जैसी बातें कर रहे हो बबलू तुम? बहन से कोई ऐसे बात करता है?” अब धैर्य का बाँध टूट चुका था।

“मैं पागल….या तुम मुझे बेवकूफ़ बना रही हो?”

इतना सुनते ही मेरा चेहरा तमतमा चुका था। पूरे शरीर का रक्त जैसे चेहरे पर आ गया हो। मुझे परेशान देख कर देवर ने फ़ोन ले लिया और उसे मस्त खरी-खोटी सुनाया।

वह भी कुछ कम नहीं था झट बोला “मैं तो बिन्नी के लिये फ़ोन करता था आप ही मिन्नी समझ बैठे तो मेरी क्या गलती?”

मेरा प्यार से बुलाया जाने वाला नाम ‘मिन्नी’ है। इस कारण ही गलतफहमियां पैदा हुईं या आखिरी में उसने पैंतरा बदल दिया। यह भी एक रहस्य ही रह गया कि ये सचमुच पड़ोस वाली बिन्नी के लिये फ़ोन था या कोई मनचला फ़िरकी ले रहा था।

 

खैर! कुछ बातें ताऊम्र याद रह जाती हैं और अच्छा-खासा सबक भी दे जाती हैं। अब मज़ाल कि यू ही अंदाज़ पर बात कर लूँ। अच्छी तरह से खंगाल कर पूछ लेती हूँ कि भाई आप कौन हैं? कहाँ से बोल रहे हैं और आपको किनसे बात करनी है? ये बबलू भी ना! अच्छा पाठ पढा गया….सच भी है…. काठ की हाँडी एक बार ही चढ़ती है!

आर्या झा

मौलिक व अप्रकाशित

Related posts

Leave a Comment