बदलते परिवेश मे शिक्षा और शिक्षकों का महत्व

गुरुर ब्रम्हा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वर:

गुरु: साक्षात्परब्रम्हा तस्मै श्री गुरुवे नम:

प्राचीन काल से ही इस देश में गुरु को ईश्वर का दर्जा दिया गया है, इन्हें सत्ता के समानांतर या बराबर की शक्ति प्रदान की गई थी, राजशाही में एक राजा अपने गुरु के द्वारा बताए गए मार्ग में चलते हुए सत्ता का संचालन करता था, जब भी राजा के सामने कोई अनिर्णय की स्थिति होती तब वो गुरु की सलाह पर उसका निर्णय करते थे, इससे यह परिलक्षित होता है कि राज्य में गुरु को असीमित शक्ति और उचित सम्मान प्राप्त था, इसी प्राचीन परम्परा को अक्षुण बनाए रखने के लिए आधुनिक भारत में 05 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रुप में मनाने का संकल्प लिया गया। अब सवाल यह है कि 05 सितम्बर की तारीख को शिक्षक दिवस के रुप में मनाने के लिए क्यों तय किया गया, जैसा कि सबको विदित है कि इस दिन भारत के पहले उपराष्ट्रपति भारतरत्न महामहिम डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन है और इनके जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया क्योंकि ये स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति थे जिन्होंने अपने व्यवसायिक जीवन की शुरुआत एक अध्यापक के रूप में की थी और वे एक शिक्षाविद के रूप में विश्व में विख्यात थे। डा. राधाकृष्णन शिक्षा क्षेत्र के कई उच्च पदों से होते हुए अंत में भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति और फिर देश के दुसरे राष्ट्रपति के पद तक पहुंचे, इसके बाद से ही डा.राधाकृष्णन के जन्मदिन को देश के समस्त शिक्षकों के सम्मान में शिक्षक दिवस के रुप में समस्त शिक्षण संस्थानों में मनाने की परम्परा अनवरत जारी है ।

मेरे विचार में हम सबके जीवन की पहली गुरु मां है और मां ही हमें गुरु से मिलाती है और फिर गुरु हमें अपने ज्ञान के माध्यम से ईश्वर से साक्षात्कार करवाते हैं, इसलिए मेरा मानना है कि आज के दिन जीवन की प्रथम गुरु मां को नमन करते हुए अपने जीवन के सभी गुरुजनों का वंदन अभिनन्दन करें । युग बदल गया, लोग बदल गए, गुरु अब शिक्षक कहलाने लगे पर मुझे ऐसा लगता है कि आज भी गुरु का उतना ही महत्व है जितना प्राचीन काल में हुआ करता था आज भी एक शिक्षक के हाथों में किसी भी राष्ट्र के भविष्य को गढ़ने का, चरीत्र निर्माण करने की जिम्मेदारी है इसलिए हमें इस देश में शिक्षकों का सम्मान केवल शिक्षक दिवस को ही नहीं अपितु पूरी जिन्दगी उन्हें सम्मान देना चाहिए, आजकल हमें गुरु या शिक्षक का महत्व केवल शिक्षक दिवस को याद आता है, इस दिन हम अपने शिक्षकों का गुणगान कर उन्हें फूलों की माला पहना कर उनका उचित सम्मान कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं, उसके बाद साल भर हम उन शिक्षकों को भूल जाते हैं । हमारे समाज में आज शिक्षकों के प्रति दृष्टिकोण भी अच्छा नहीं है, इन्हें बहुत हलके में लिया जाता है, जब आप किसी सभा में अपना परिचय एक शिक्षक के रुप में देंगे तो पूरे सभागार में आपकी ओर किसी की नजर नहीं जाएगी और सब नजर अंदाज करेंगे लेकिन वहीं एक व्यक्ति अपना परिचय प्रशासनिक या पुलिस अधिकारी के रुप में देगा तो उस सभागार में सबकी निगाहें उनकी तरफ जाएगी, जबकि इस समाज में एक प्रशासनिक अधिकारी से शिक्षक का कार्य अधिक महत्वपूर्ण है पर हमारे समाज में किसी व्यक्ति को आजकल पैसे से या उसके अधिकारों से तौला जा रहा है न कि उसके कार्यों से, ये एक समाज के पतन का मुख्य कारण है । 

 

 

वर्तमान समय में आज भारतीय समाज में शिक्षक और छात्र का संबंध व्यव्हार अंत्यत जटिल हो चुका है।शिक्षक आज सिर्फ पैसों के लिये पढ़ाता है, कक्षा में विषय व्याखान से शुरु होता है  और वहीं व्याख्यान पर खत्म होता है। छात्र भी सिर्फ डिग्री के लिये पढ़ता है,ऊंँचा पैसा देता है,ऊँची डिग्री लेता है। छात्र जीवन को पूरा करना, सिर्फ पैसे कमाने के योग्य बनने का ध्येय रह गया है ।फिर ज्ञान कैसा ? वहां सिर्फ जानकारी प्राप्त करने के लिये ही वे शिक्षक के सम्पर्क में रहते हैं।

गुरु और शिष्य की परंपरा तो प्राय: समाप्त ही हो गई है।

विद्यार्थियों में शालीनता नहीं रही।

उनमें क्षिति जल पावक गगन समीरा का तत्वबोध नहीं है, देशभक्त बलिदानियों की अनुभूति नहीं है, अध्यात्म का पवित्र आभासी नहीं है,माता पिता के देवत्त्व भूति की अनुभूति नहीं है, अपने मातृभूमि से प्रेम नहीं है,

पारिशुद्ध प्रेम का आदर नहीं है ।

तो फिर हम उन्नत राष्ट्र की कामना और कल्पना  प्रेम एकता और भाईचारे के साथ कैसे कर सकते हैं।

आज पश्चिमि सभ्यता के आचरण  व्याकरण के होड़ में युवा उसी पद्धति में ढलते जा रहें हैं,अपनी सुदृड़ संस्कार संस्कृति की वास्तविकता को तो हम  खोते ही जा रहे हैं। आधुनिक होना अच्छी बात है,ऊंँच्च

तकनीकी उद्योग का उन्वान होना भी अच्छी बात है । लेकिन आदर्श विहीन सिर्फ  मैकाले की पद्धति अपना कर नहीं ….।

 

कर्मठ, निष्ठावान, बौध्दिक, मानसिक, चरित्रवान भावी पीढ़ी अगर हमें तैयार करनी है तो शिक्षक पात्र को मूल्यवान उदारवादी, बुद्धिमान ,चरित्रवान के साथ सदभावी होना आवश्यक है।क्यों की शिक्षक ही राष्ट्र निर्माता होता है।

 

 कभी विश्वविख्यात नालन्दा विश्वविद्यालय , तक्षशिला में कर्म   धर्म एवं श्रम की सम्पूर्ण शिक्षा दी जाती थी। आज भी भारत में कुछेक वो गुरुकुल पद्धति की शिक्षा दी जाती है ।

विद्यार्थियों के सम्पूर्ण व्यवक्तिव विकास के लिये हमें आधुनिकता के साथ प्राचीन ज्ञान शक्ति का अवलोकन कर आत्मसात करना होगा ।

वर्तमान में बदल रहे शिक्षकीय मूल्यों को दृष्टी में रखते हुए एक ऐसी सुदृढ़ शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें शिक्षक के साथ विद्यार्थींयों की भी सक्रिय सहभागिता हो।अत: नवीन शिक्षण पद्धतियों,सूचना प्राद्धोयोंगिकयों एवं सदी के बदल रहे शिक्षाशास्त्र से समायोजन बिठाना होगा।यह कार्य समाज शिक्षक एवं सरकार ।के संयुक्त प्रयासों से ही संभव हो सकेगा।

शिक्षा मन शरीर बुद्धि और आत्मा के विकास का साधन है।

विद्यार्थियों को प्रकाश पुंज बनाना तो माता पिता एवं शिक्षक का अंत्यत महत्त्वपूर्ण कार्य है।

“तमसो माँ ज्योतिर्गमय”

यानि अंधेरे से उजाले की ओर जाना,यह भूमिका शिक्षक की होती है। विद्यालय की संस्कृति एक साझा सकारात्मक संस्कृति का विकास पथ है,जहांँ पाठ्यचर्या में विद्यार्थियों का समूह शामिल होता है।जिसके पथप्रदर्शक शिक्षक होते हैं।जहाँ ज्ञान साध्य है वहीं शिक्षा उस ज्ञान को प्राप्त करने का साधना है। यह कार्य कराने के लिए शिक्षक अहम भूमिका निभाते हैं। विद्यार्थी एक दीप स्तम्भ कैसे बने यह सोचना शिक्षक का काम है……।

आज शिक्षा के बदलते परिवेश में बहुत कुछ नाकारात्मक परिणाम आ रहें हैं ।

आज विद्यालयों में निम्न राजनीति दांव-पेंच के कारण आंतक का परिवेश बन गया है। विद्यार्थी पथ से भटके हुए लगते हैं। हम बाबर, ख़िलज़ी,अकबर  पढ़ते हैं। हम वेदांत , रामायण, गीता,चाणक्यनीति प्रताप,आजाद, सुभाष कहाँ पढ़ते हैं ?

विद्यार्थियों के सर्वांगींण विकास का मार्ग अध्यात्म पवित्रता के पथ से आता है। जो कल के शिक्षक भी बनेगें, तो वो पथ आजके शिक्षक को ही प्रस्शत करना है।

आज शिक्षा के बदलते स्वरुप और शिक्षा प्रणाली पर गंभीर विचार विमर्श करने की जरूरत है। 

शिक्षक का एक महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व होता है । शिक्षा देने वाला,ज्ञान देने वाला आदरणीय गुरु, जिनका एक सम्मानित स्थान एवं प्रतिष्ठित पद होता है।

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