दोहे

 

*दोहे*- गीत शब्द पर
—————-
अभी अधपके भाव हैं, और क्षुधातुर गीत।
साज शब्द के बेसुरे, बजा रहे संगीत।

छंद हीन हैं बस्तियां, कविताओं की मीत।
बेघर होकर घूमते, हैं बंजारे गीत।

पावस सारी यामिनी, गाता था मल्हार।
छाजन पर पड़ती रही, गीतों सी रसधार।

पगडंडी से पाँव के, परिणय के ये गीत।
सैकत अणुओं पर लिखे, श्रम से हुये प्रणीत।

मौसम ने है लिख दिया, शपथ पत्र बेनाम।
प्राण प्राण है गा रहा, गीत प्राण के नाम।

हर झरने से फूटता, है अनहद संगीत।
ताल दे रहीं ऊर्मियां, कलकल गा कर गीत।

सुना कभी क्या आपने, नीरवता का शोर।
गीत सुनाता मौन है, सुनता मौन विभोर।

घुलते गीतों में सदा, पीड़ा दुख संताप।
गीत वहाँ आनीत हैं, जहाँ चाहते आप।।

 

सत्यप्रसन्न

Related posts

Leave a Comment