दोस्ती बचपन की

मैं सातवीं कक्षा में पढ़ती थी। सात सहेलियों की टीम एक चक्रव्यूह, “आपस में इतनी बेहतर गुटबंदी” कि बाहर वाले इस चक्रव्यूह को कितना भी तोड़ना चाहे मुँह की खाते थे ।
मेरा स्कूल घर से काफी दूर था।। पैदल ही जाते थे, चलते-चलते सारी सहेलियां रास्ते में मिलती जाती और झुंड बन जाता । पूरी मस्ती करते जाते, कभी टेढ़ी चलने की कोशिश करते, और कभी आंख बंद करके चलने की कंपटीशन । हमारे मम्मी पापा को हमारी ज्यादा परवाह नहीं होती थी आजकल के बच्चों को क्या पता कि घर से स्कूल का “पैदल का रास्ता” कितना लुभावना होता था। रास्ते में एक कुआं पडता था उसमें जरूर जोर से आवाज लगाते थे तो रिपीट की आवाज(echo) आती थी यह हरकत हम रोज दोहराते थे। स्कूल के सामने एक बूढ़े बाबा चूरन बेचते थे, करंट वाला काला चूरन,खरीदकर सहेलियों को खिलाकर मजे लूटते थे । और 25 पैसे का लाल चूरन जरूर खाते थे ।संतरे की गोली पर तो मरते थे , दोस्तों से छुपा छुपा कर रखनी पड़ती थी । ₹5 का Reynolds का पेन तो दुनिया की बहुमूल्य विरासत में से एक था ,जिसके पास होता था क्लास में उसका अपना ही कोई क्लास होता था।
पहले रविवार की छुट्टी वाले दिन दोस्तों से मिलने उनके घर जाना होता था। कभी स्कूल की कॉपी मांगने एक बार ,,,फिर लौटाने दूसरी बार, दिन में पता नहीं कितनी बार, मिल लेते थे।। आजकल बच्चे फोन से बात कर लेते हैं, फोन पर शक्ल देख लेते हैं, फोन पर काम भी मांग लेते हैं, आजकल की दोस्ती फुनिया दोस्ती है।
हमारा कोई ट्यूशन-फ्यूशन, नहीं होता था इंटेलिजेंट इतना समझते थे अपने आपको कि उचित मार्गदर्शन मिलता तो हमें आज इंडिया में मेड इन इंडिया के राफेल उड रहे होते ।
हमारे 1 दिन ना मिलने पर पेट में दर्द हो जाता था। आज मेरी दिल्ली से मामा आए हैं, तो आ रही सारी सहेलियां आज मेरे भैया हॉस्टल से आए हैं लो आ रही सारी सहेलियां आज हम बरसाने मंदिर दर्शन करने जा रहे हैं चल दी।
सारी सहेलियों को बस मिलने का बहाना चाहिए होता था,
वह ना मिलने का पेट दर्द आज भी होता है और आंखों से बह निकलता है। मेरी बढ़ती उम्र के साथ मेरी बचपन की दोस्ती और ज्यादा जवाँ हो रही है। वह कही अनकही कितने ही वाकया….. , वह मस्ती …वह शरारतें ….बस याद बनकर चमकती है मेरे हृदय की आसमां पर……….
हीतू सिंगला

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