दबे अहसास

 

कहा मांगा था मैंने कुछ तुम्हारा,

बस एक पल ही तो चाहा था तुम्हारा,

शायद इतना तो हक था हमारा

एक ही आवाज आवाज में तुम्हारी

झूम उठता था मन मेरा,

उस उमंग को नाम दे देते तो,

क्या चला जाता तुम्हारा ।

आखिर बीज जो पनप रहा था

मेरे बंजर दिल में एहसास का तुम्हारे,

क्यों दबाए बैठे थे ज़ज्बात अपने दिल में,

आखिर क्या डर था?

जताते तो सही इतना तो हक था तुम्हारा,

अभी स्पर्श भी नहीं किया तुम्हे,

और सब कुछ सौप दिया,

फिर मेरा मुझ में कहा कुछ रहा,

सब कुछ तो हो गया था तुम्हारा,

कोई शिकवा कोई शिकायत नहीं मुझे तुम से,

बस एक बार जता देते की सब कुछ हूं मैं तुम्हारा,

कहा मांगा था मैंने कुछ तुम्हारा,

बस एक पल ही तो चाहा था तुम्हारा,

शायद इतना तो हक था हमारा ।

(नेहा सिंह)

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