तृप्ति

तृप्ति

 

 

 

 

“आज कैसी तबीयत है मि. सहाय?”

“एक कैंसर का मरीज कैसा हो सकता है?”

“आप ठीक हो जाएँगे।”

“यही विश्वास तो कोई नहीं दिलाता तुम्हारे सिवा! थोड़ी देर और ठहर सकती हो? स्नेह के चंद बोल सुन कर जी उठता हूँ।”

“आप क्या कह रहे हैं मि.सहाय? भरा-पूरा परिवार है आपका! इस विषय में आप उनसे बात करें मुझसे नहीं!”

“मुझसे किसी को कोई दरकार नहीं! सब मेरे मरने की राह देख रहे हैं। तुम्हारे सानिध्य के बदले मैं पैसों की बरसात कर सकता हूँ!”

आँखों में जाने कैसी तड़प थी जिसे देखते ही कर्मयोगिनी सिस्टर भी घबरा गई। मौत से जूझते रोगी में जीवन की आखिरी सांस तक उम्मीदें भरती हुई ये कैसी आस बँधा बैठी थी।

नर्स का काम भी आसान नहीं होता। कैंसर वार्ड की ड्यूटी में विशेष रूप से सुमधुर वाणी और सुशील व्यवहार की उम्मीद की जाती है। उसके सभ्य व्यवहार के बदले ऐसा प्रस्ताव? समझ में नहीं आ रहा था कि क्या सोच कर पैसों की बातें कही। आज उनके प्रति सम्मान के स्थान पर दुख ने ले लिया था। मेट्रन के पास पहुँचकर अपनी ड्यूटी बदल देने की बात कह डाली।

“अरे! वह बहुत बडा बिजनेसमैन है और हाॅस्पिटल का ट्रस्टी भी। अकेलेपन से घबड़ा गया है शायद। तू नहीं तो कोई और सही। वह पैसों का प्रलोभन देकर किसी को भी झुका सकता है। क्यों नहीं हम ये बातें उसकी पत्नी को बताएँ।” मिस रोजी ने सुझाया।

 

“क्या लाभ होगा? क्या वह हमारा यक़ीन करेंगी?”रूबी ने पूछा।

“अपने पति को तो संभालेंगी। उनकी कोई आपसी समस्या हो सकती है। किसी के जूते में कितनी कीलें हैं ये तो बस पहनने वाला ही जानता है।”

मिसेज सहाय रोज की भाँति सुनहले फ्रेम के चश्में और हाथों में अखबार थामे पति के हाॅस्पिटल बेड के बगल की कुर्सी पर बैठी नजर आईं। साथ आए नौकर ने साहब का खाना प्लेट में लगाया और उन्हें उठा कर खिलाने लगा। आपस में कोई संवाद नहीं था। मिस रूबी और रोजी को यह नजारा कुछ अजीब सा लग रहा था। मि.सहाय कैंसर के आखिरी चरण में थे। कहने के लिए पत्नी रोज आतीं पर औपचारिकता ही निभा रही थीं। क्या वैभवशाली परिवार में प्यार नहीं होता या प्यार धन के बोझ तले दब जाता है?

उनके स्नेह की क्षुधा का अंदाजा दोनों को लग गया था। मरीज के स्वास्थ्य व दवा संबंधी बातें बताकर वह बाहर निकल आईं। कुछ दो घंटों के बाद मिसेज़ सहाय उठने को हुईं तो मेट्रन ने उन्हें अपने कमरे में बुलाया।

“आपके पति कुछ ही दिनों के मेहमान हैं। अगर हो सके तो उन्हें कुछ ज्यादा समय दें।”

“कहना क्या चाहती हो? साफ शब्दों में बताओ।”

“वह अस्पताल की नर्स से प्यार की मनुहार कर रहे थे।”

“ओह! मेरे पति पर तोहमत लगाते तुम्हें शर्म नहीं आती?”

“आपके सामने सच्चाई रख दी है। बाकी आपकी मर्जी!”

“बाहरवालों से पहले वह मुझसे भी तो कह सकते थे?”

“शायद आपके रोबीले व्यक्तित्व में उनकी मनोहारिणी पत्नी दब गई हैं।” हिम्मत कर मिस रोजी ने सीधी बात कह डाली। वैसे भी सही भावों के साथ उचित दिशा में कदम उठाने में वह ज्यादा सोचती नहीं थीं।

 

पत्नी सबकुछ सह सकती है पर जीते जी अपने  सौभाग्य पर डाका नहीं!

मेट्रन रोजी की बातों ने उनपर गहरा असर डाला। पति के मन को पढ़ने की चाहत में वह रातों को वहीं रूकने लगीं। पिछली रात खुब बातें कीं। चार बजे सुबह ही पानी का गिलास पकड़ाया तो वह पुराने दिनों में खो गए थे।

“कैसी नाजुक गुलाबी गुड़िया सी थी तुम! लगता था छूने से टूट जाओगी।”

“आप भी तो सफेद सूट में किसी अंग्रेज से कम नहीं लगते थे!”

“दूरियाँ क्यो आ गईं हमारे बीच?”

“दूर आप हुए। पैसे कमाने की धुन लगी थी।”

“पैसे तुम्हारे लिए बनाए और तुम्हें ही खो दिया।”

“खोया नहीं बस प्यार सो गया। फिर ढलती उम्र में ख्याल ही तो रखा जा सकता है….!”

“युवा आँखों में सपने होते हैं,प्रौढ़ में जिम्मेदारियां। उम्र के इस पड़ाव पर दिल साथी के नजरों में स्नेह ढूंढने लगता है। देखना चाहता है कि जिनके सुख-दुःख के लिए ताउम्र जलता रहा, उन्हें उसकी कद्र है भी या नहीं?”

“क्या आप भी?”पति की स्पष्टवादिता ने उसके हृदय में भी यूवा संवेदनाओं का संचार कर दिया था।

“एक बार फिर से प्रेम करो शांता! अपने होने का अहसास कराओ मुझे! अपनी बाँहों में भर लो! मैं मरने के पहले जीना चाहता हूँ!”

पति के अनुनय-विनय में शांता जी के सारे गिले-शिकवे जाते रहे। हृदय पसीजा तो झट पति के मन की डोर को थाम लिया। उनके सिर पर हाथ फेरती हुई उन्हें बाँहों में समेट लिया। दोनों को गहरी नींद आई। कुछ ही घंटों में सुबह हो गई। शांता जी अकेली जगीं। महीनों से एक अच्छी नींद के लिए तरसे मि. सहाय निढाल हो चिर निद्रा में चले गए। विलाप करने पूरा परिवार पहुँचा पर आज मृतक के चेहरे की तृप्ति तीन चेहरों पर आत्मसंतोष की रेखाओं के रूप में विद्यमान थीं।

 

“आपका बहुत धन्यवाद मिस रोजी! आपकी वजह से मैं अपने पति के आखिरी पलों में उनके साथ रह पाई।”

“सच कहूँ तो इसका सारा श्रेय रूबी को जाता है। उसकी सच्ची सेवा और ईमानदार स्वभाव के कारण ही हम उनके जीवन के इन आखिरी दिनों की तनहाईयों को समझ पाए।”

मिस रूबी जो सही मायनों में सेविका थीं, अभी भी निःस्वार्थ भाव से मि. सहाय को अंतिम विदाई दे रही थीं।

आर्या झा

मौलिक व अप्रकाशित

Related posts

Leave a Comment