चाय और चाह

सौन्दर्य 

भावना मयूर पुरोहित  हैदराबाद 

18।8।2020।

हिमालय  प्रवास में, बस के बाहर,

तो बहार! बस सौन्दर्य  ही सौन्दर्य 

किंतु, बस के भीतर  भी… 

सौन्दर्य  ही सौन्दर्य!!! 

एक   विरल चिरस्मरनीय दृश्य… 

जो मेरे मानसपटल से,

हटता ही नहीं। 

ठंडी से,   बस के धक्के से, वृद्धावस्था से,  एक वृद्ध दंपति,, 

थरथर  कांपना। 

कंपन कंपन कंपन… 

कंपित हाथों से ,संभालते हुए, 

एक दूसरे को, वृद्ध  पति, 

अपनी वृद्धा के लिए, 

कंपित हाथों से, चाय लाया अध रुकी बससे,  उतरकर… 

चलती बस में,अपनी जगह तक आते, कंपित हाथों से  पकड़े, 

चाय का प्याला।फिर  कंपन, 

वृद्ध  के हाथों में… 

कंपन!!!  हमारे  ह्रिदयमें भी… 

मुझे लगा वाह!!! यह चाय का प्याला!!! 

या   फिर  ‘चाह’ का प्याला। 

भावना  मयूर   पुरोहित हैदराबाद 

18।8।2020।

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