घर का ताज थी वो

“डम-डम डीगा-डीगा मौसम भीगा-भीगा…” दूर से सुनाई देते गाने की धुन कान में पड़ते ही सीने पर हजारों सांप लोट गये, रागिनी बुआ दनदनाती हुई बाहर गयीं और मजदूरों पर भड़क उठीं “ऐ लल्लन बंद कर ये गाना, जरा जल्दी हाथ चला और काम खत्म करके अपने घर निकल।” 

“जी दीदी जी” लल्लन ने झट से रेडियो बंद कर दिया।

“जाने दे बेटा घर में शादी का माहौल है क्या-क्या बंद करवायेगी।” दादी ने पल्लू से आंसू पोंछते हुये बोला,

“जब भी ये गाना बजता है बहुत दर्द दे जाता है, मंझली कहीं भी हो ये गाना सुनते ही बस नाचना शुरू कर देती थी।” सुधा ताई ने मुंह में साड़ी ठूंस कर अपने आंसू रोकने की नाकाम कोशिश की।

“पता नहीं क्यों सुधा भाभी ऐसे मौकों पर मंझली भाभी की छवि आंखों से हटती नहीं है।” नीता बुआ सुधा चाची को पानी का गिलास देते हुये बोलीं, 

“अरे! वो इस घर का ताज थी…. चली गयी सब वीरान करके. कौन कहेगा इस घर में शादी है…अगर आज वो होती तो… खैर, तुम लोग बुला लो आस- पास की औरतों को और ढोलक पूजन करवाओ।” अब तक सबकी बातें सुन रहे बूढ़े दादा जी छड़ी के सहारे उठकर बाहर जाते हुये कांपती आवाज में बोले।

आज चार साल हो गये मंझली चाची को गये मगर आज भी उनकी यादें हर शख्स के दिल में ताजा हैं, तीन बहुओं में मंझली थी सुमिता चाची, खूबसूरती में उनकी तुलना मधुबाला से की जाती थी उस पर भी शहर में पली- बढ़ी वैसा ही रहन-सहन, उनका परम चाचा से प्रेम विवाह हुआ था, घर में कोई राजी नहीं था मगर चाचा की जिद पर सबने बेमन से शादी करवा दी, तब से लेकर हमेशा के लिये वो इस घर की ही हो गयीं।

 

मुझे आज भी याद है जब रागिनी बुआ ससुराल से लड़कर दुधमुंहें बच्चे को लेकर चलीं आयीं थीं, बुआ के लड़ाकू स्वभाव के कारण कोई उन्हें अपने साथ नहीं रखना चाहता था, तब मंझली चाची ही थीं जिसने बुआ और उनके बच्चे को हाथों हाथ लिया, मगर आखिरी में रागिनी बुआ ने ही हर जगह चाची की बुराईयों के पुल बांधे कि उनके बच्चे का ठीक से ख्याल नहीं रखा। 

सुधा ताई के बेटे के जन्मदिन पर मंझली चाची को ही स्वादिष्ट खाना बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गयी, अचानक कढ़ाई पलट गयी और गर्म तेल से पूरा हाथ जल गया, खूबसूरत हाथों पर वो जला हुआ भद्दा और बड़ा सा दाग हमेशा रहा, मगर मंझली चाची ने कभी उफ्फ तक नहीं की। 

दादा जी गुस्से में कितनी ही बार खाने की थाली फेंकें मगर वो अकेले ही उन्हें मनाने की हिम्मत रखती थीं, ममता की साक्षात मूरत, वात्सल्य से परिपूर्ण हृदय था उनका, क्या ननद, क्या देवरानी, जेठानी सबके लिये बस प्यार ही था उनके पास, कभी ननदों पर मां का प्यार बरसातीं, कभी सास बन कर देवरानी की गर्भावस्था में उनकी खुशामद करतीं, जेठानी को हमेशा बड़ी बहन ही माना।

किसी ने कुछ मांगा तो बिना सोचे दे दिया, किसी को कुछ खाने की इच्छा होती तो बिना समय गंवाये खुद से ही सब व्यवस्था करके व्यंजन तैयार कर दिया करतीं। उस पर भी पलट कर उनका ही मजाक उड़ता “बेवकूफ औरत है अपनी गृहस्थी उजाड़ रही है।” अच्छे इंसान को अगर और अच्छा बनने का जुनून सवार हो जाये तो वह उसे बर्बाद भी कर सकता है।

 

बिना उनकी ढोलक की थाप के महिला संगीत में रौनक नहीं आती थी, हर नया पुराना गाना उनकी डायरी की रौनक बढ़ाता, घर मोहल्ले की हर लड़की उनसे डांस सीखने आया करती थी, मौका पड़ने पर लोग ताने भी मार देते ” आता ही क्या है उसे नाचने गाने के अलावा” और आज देखो….

उनका वो पसंदीदा गाना “गैरों पे करम अपनों पे सितम ऐ जाने वफा ये जुल्म ना कर…..” उस सुरीली आवाज में भी एक अजीब सा दर्द छिपा था, ऐसा लगता मानों अपनी ही कहानी गा कर सुना रहीं हों, हां ये उनकी ही कहानी थी, शायद इसी गम में बिना किसी से अपने पति  शिकायत किये घुलती चली गयीं और एक दिन सबसे विदा ले ली। 

सबने उन्हीं को दोष दिया “पागल थी जो पति की गलतियां छिपाती रही”..

गांव की इकलौती बहू थी वो जिसके अंतिम संस्कार में एक सैलाब उमड़ पड़ा, हर आंख रोयी, क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या आदमी, क्या औरत, हर एक ने उन्हें विदाई थी। 

हर एक की जुबान पर एक ही बात ” इस घर का ताज चला गया” 

मगर मजाक की बात ये थी कि जब तक वो ताज जीवित था सबने उसे पैरों की जूती समझा, हमेशा हिकारत और बुराईयां मिलीें, तारीफ के बदले चापलूसी मिली और सबने अपना काम निकलवा के मुंह फेर लिया, पागल, बेवकूफ, कुंद बुद्धि और ना जाने क्या-क्या कहा गया, एक बार मैंने गुस्से में उनसे पूछा “मंझली चाची आप नौकरानी की तरह सबके पीछे लगी रहती हो फिर भी ये लोग प्यार क्यों नहीं करते आपको?” 

“मंझली हूं ना तेरी तरह, तुझे भी कोई कहां प्यार करता है।” चाची ने मुझे चिढ़ाते हुये कहा और खिलखिलाकर हंस पड़ीं, मैं सोचने लगी कि क्या सच में इन्हें फर्क नहीं पड़ता, फिर चाची प्यार से मुझे समझाते हुये बोलीं ” देख मैं कोई एहसान थोड़े ही करती हूं किसी पर, ये मेरा ही तो घर है तुम सब मेरे अपने हो। अपनों का काम तो करना चाहिये ना, एक दिन सबको मेरी कीमत भी समझ आ जायेगी।” 

 

सच में सबको समझ आ गया, आज घर में शादी है मगर हर तरफ सूनापन है, जर्रे-जर्रे में उन्हें महसूस किया जा रहा है, चार साल से हर पल घर के ताज को याद किया जाता है, क्यों होता है कि जाने के बाद ही इंसान की कद्र की जाती है। जीते जी उन्हें घर की बहू होने का भी दर्जा नहीं मिला और उनके जाते ही उन्हें घर का ताज स्वीकार कर लिया गया, सबके कड़वे शब्दों पर अपने प्यार की मिठास छिड़कती रहीं,, का१ा ….इससे आधा प्यार भी उन्हें पहले मिल गया होता तो वे शायद वह दर्द भी सबके साथ बांट पातीं जो अपने अंदर समेटे ही वो चली गयीं…….

दोस्तों, जो आज है पता नहीं कल हो ना हो, जिसमें आज कमियां निकालते नहीं थकते जरा ठण्डे दिमाग से सोचिये कि क्या वाकई उसमें कोई अच्छाई नहीं है, क्या सच में उसका आप पर कोई अहसान नहीं है, जिंदा इंसान की कद्र करो चाहे वो बहू हो या कोई और आपका अपना हो, क्योंकि जाने के बाद तो पराये भी दुख जताने आ ही जायेंगे।

धन्यवाद दोस्तोेें,

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आपकी दोस्त

प्रज्ञा तिवारी

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