क्या आप जैसा बनना जरूरी है

अनुराग के मम्मी पापा दोनों डॉक्टर है, और अब दीदी भी एम.बी.बी.एस के फाइनल इयर में है। जब से होश संभाला तब से बस यही सुनता आया है, अरे डॉक्टरों की फॅमिली है तुम्हारी,तुम तो डॉक्टर ही बनोगे. दोस्त भी यही कहते “इसका तो पैदा होते ही कैरियर फिक्स हो गया, ये तो डाक्टर बनेगा,हमे ही सोचना पडेगा कि हम क्या बनेंगे “.

जब किसी के घर जाता तो वे कहते, “कुछ सीखो अनुराग से डॉक्टर बनेगा बड़ा होकर,तुम्हे तो ये ही नहीं पता कि बनना क्या है”.

लेकिन अनुराग तो फैशन डिज़ाइनर बनना चाहता था,उसे हमेशा लगता था कि उसके डिजाइन किए कपडे बड़े-बड़े सेलिब्रिटी पहने..उसने साईंस सब्जेक्ट भी इसलिए लिया था,क्योंकि उसमें बहुत सी ड्राइंग होती है,और पढ़ने में वैसे भी बहुत तेज था,लेकिन अपने सपने के बारे में उसने कभी किसी को नहीं बताया था,न जाने क्यों उसने खुद ही सोच रखा था,कि उसके पेरेंट भी उसे डॉक्टर ही बनाना चाहते होंंगे।

उसने मेडिकल इंटरेंस एक्साम क्लीयर कर लिया, सब बहुत खुश थे.बिना किसी को अपने सपने के बारे में बताए हॉस्टल आ गया.फ्रेशर्स पार्टी की तैयारी चल रही थी,उसने रिक्वेस्ट करके सबकी ड्रेस डिजाइनिंग का जिम्मा अपने ऊपर ले लिया.उसके डिजाइन किए ड्रेस देखते ही बनते थे,सबने जमकर तारीफ की, कुुछ दोस्तो नें कहा कि तू यहाँ अपना टैलेंट वेस्ट कर रहा है.अब ये बात अनुराग के दिमाग में घर कर गई कि वो बेकार में मेडिकल की पढ़ाई कर रहा है,ये उसका सपना नहीं.कई बार उसके मन में विचार आया कि घर में बात करे,लेकिन दोस्तों ने कहा पागल है क्या तेरे घर में सब डॉक्टर हैं,वो लोग कभी नहीं मानेंगे, अब धीरे-धीरे उसके मन में निगेटिव विचार आने लगे ,वो डिप्रेशन में चला गया उसे लगने लगा ऐसे जीने का क्या फायदा जहाँ अपनी मर्जी का कैरियर भी न ले सके.आखिर एक दिन उसने तय कर लिया कि वो अपना जीवन समाप्त कर लेगा.

 

अनुराग अपनी कैंपस की छत पर गया और बस कूदने ही वाला था,कि उसे लगा एक बार घर में बता तो दूं कि मैंने सुसाइड क्यों किया,उसने अपने पापा को फोन किया “हैलो पापा, वो मैं कहना चाहता था,कि मैं……” हाँ अनु बोलो मैं क्या”..वो मैं फैशन डिजाइनर बनना चाहता था….अनुराग आगे बोलना चाहता था,लेकिन बीच में ही उसके पापा बोल पडे”वाउ दैट्स वैरी गुड,समथिग डिफरेंट, अरे तुमने पहले क्यों नहीं बोला,खैर कोई बात नहीं अब भी देर नहीं हुई पता करो बेस्ट इंस्टीट्यूट कौन सा है”मम्मी भी उनकी बातें सुन रही थी स्पीकर पर ,”अनु चल अच्छा है,मैं भी ये डॉक्टरों वाला सफेद कोट देखकर बोर हो गई थी,अच्छी-अच्छी ड्रेस बनाना ,तेरी सबसे पहली क्लाइंट मैं ही होंगी”..पीछे से दीदी बोल पडी”वाउ अनु मेरी शादी का लहंगा तू ही डिजाइन करना”..अनुराग ने रूधे गले से पूछा आपलोग खुश है?..”और क्या,बस बेटा जो भी काम करो मन लगा कर खुशी से करो..पापा ने कहा और फोन रख दिया.

अनु को काटो तो खून नहीं ये क्या करने जा रहा था मैं,क्यों मैंने पहले ही अपने परिवार वालों से बात नहीं की,वो लोग कितने सपोर्टिंव है,मैंने क्यों अपने आप ही सबकुछ सोच लिया.उसे अपनी सोच पर बेहद पछतावा हो रहा था.

आज नेशनल इन्सटिट्यूट ऑफ़ फैशन डिजाइनिंग में अनुराग को बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड दिया जा रहा है,और जब अनुराग से अपनी उपलब्धि के बारे में कुछ कहने को कहा गया तो उसने कहा”दोस्तों मैं आज जो कुछ भी हूँ अपने परिवार की वजह से हूँ,न जाने क्यों हम सब एक अवधारणा बना लेते है,कि हमारे परिवार वाले हमें नहीं समझेंगे, बस अपने दोस्तों को ही अपनी जिंदगी बना लेते हैं,और आसानी से बाहर वालों की बातों में आ जाते हैं,बल्कि सच तो ये है कि,उनसे ज्यादा अच्छे से हमें और कोई नहीं समझ सकता, आप सब से एक गुजारिश है,अपने पेरेन्ट्स को भले अपना दोस्त न समझो लेकिन इस काबिल तो समझो,कि अपने मन की बात उनसे कह सको,धन्यवाद।”

मंजुला दूसी

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