कल, कभी नहीं आता

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कल, कभी नहीं आता, जो आता है वो है आज
आज जाने दे, कल बहुत सारा समय दूँगा,
माफ कर दो, आज काम ज़्यादा था, आ नहीं पाया,
लेकिन कल… कल पक्का आऊंगा,
कुछ अपनी कहूँगा, कुछ तुम्हारी सुनूँगा,
आज, फिर तुम्हारा कल आया था,
तुम्हारा इंतज़ार कर, बीता हुआ कल हो गया।

कल, कभी नहीं आता,
जो आज छोड़ कर जा रहे हो, वो यहीं छूट जाएगा
क्योंकि जो बीत गया, वो पल, अब लौट कर नहीं आएगा
जो बातें अधूरी रह गईं हैं, उन्हें अब यूँ ही छोड़ देते हैं,
जानती हूँ अब जो आओगे, कोई नया बहाना बनाओगे
तो क्यों ना अब बीती बातों का रुख मोड़ देते हैं।

कल, कभी नहीं आता,
मजबूरियां जो आज हैं, कमज़ोरियों का जिसका एहसास है,
वो कल भी रहेंगी, वो कल जिसके तुमने सपने हैं सजाए,
वो कल, जिसमें तुमने रेशम हैं बिछाए,
देखो के आज… तुम्हारा वो कल फिर से आया था,
लेकिन, एक बार फिर बेचारा मजबूरियों के हाथों बिक गया,
और कल आने का वादा कर, फिर कहीं छुप गया।

कल, कभी नहीं आता, तुम चाहो तो जा सकते हो,
कल आने का वादा कर, एक वहम में जी सकते हो,
लेकिन मैं जानती हूँ, कि जिस धूप का तुम्हें इंतज़ार है,
जिस कल पे तुम्हें एतबार है, वो कल….
कल भी नहीं आएगा, जो आएगा वो होगा आज,
जिसमें फिर तुम कल का वादा कर चले जाओगे,
मेरे लाख बुलाने पर भी, लौट कर ना आओगे,
तो क्यों ना, उस कल का साथ में इंतज़ार करें,
और आने वाला हर कल, हम आज में जियें !

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