एक बेटे का खत

लिखते लिखते आँखों से आँसू गिर रहे थे….अनुराग ने ख़त या यूँ कहे मेल लिखना शुरू ही किया था कि आँखे धुँधला गईं।

डियर माँ पा,
आज आपकी बहुत याद आ रही है।याद तो पिछले कई दिनों से आ रही है ,पर अब न, रहा नहीं जा रहा यूँ अकेले। जानता हूँ अपनी जिद से आया था यहाँ। बड़ी बड़ी डींगे भी हाँकी थी कि “आपलोग ना, बच्चा ही समझो मुझे…अरे ! मुझे सब आता है कर लूँगा मैनेज मैं। फलाना ढिमकाना। लेकिन जब से ये लॉकडाउन हुआ है ना, तब से बिल्कुल ही अकेला पड़ गया हूँ।
जानता हूँ जब चाहे आपसे वीडियो में बात कर सकता हूँँ….लेकिन मन कहाँ भरता है यार। रोज सुबह उठता हूँ तो मन करता है कि नाक में  माँ के हाथों के बने नाश्ते कि खुशबू  भर में  जाए और मैं वैसे ही भागकर आऊँ और माँ को पीछे से पकड़ लूँ और पूँछू कि क्या बनाया है..फिर आप सर पर मीठी चपत लगाकर कहो कि जा पहले मुँह तो धो के आ। अब तो ना, कार्नफ्लेक्स और दलिया खा खा कर  उबकाई आने लगी है..और मैं कितनी भी रेसिपी ट्राई कर लूँ वो आपका वाला टेस्ट नहीं आता यार..मिलाती क्या हो आप खाने में कि हर डिश इतनी टेस्टी बन जाती है।
पापा  आपकी कमेंट्री के बिना कोई भी मूवी देखने में मजा नहीं आता। आपकी डाँट फटकार… वो झूठ मूठ का गुस्सा होना… लेकिन फिर हर काम में मेरी मदद चाहिए भी होती थी आपको…बड़ा मिस करता हूँ मैं वो सब।
लेकिन ना, थोड़ा नाराज़ भी हूँ…क्यों इतने लाड़ प्यार से बड़ा किया। क्यों थोड़ी सख्ती के साथ कुछ जरूरी काम नहीं सिखाए। क्या खाना बनाना सिर्फ दीदी का ही काम था। देखो ना अगर उनके साथ साथ मुझे भी सिखा दिया होता तो रोज मुझे ऐसा जला,उबला खाना नहीं खाना पड़ता। क्यों बरतन माँजना ,आटा लगाना, झाड़ू पोंछा करना नहीं सिखाया माँ? और पापा पता है मर्द को भी ड़र लगता है, दर्द भी होता है और रोना भी आता है…और इसमें कोई गलत बात नहीं है…देखो ना मुझे आ रहा है अभी। क्यों हमेशा बच्चा ही बना रहने दिया मुझे? सीखने देते ना छोटे मोटे हर वो जरूरी काम जो हर इंसान को आने चाहिए।
अब तो बस जल्दी से ये सारी परिस्थितियाँ नार्मल हो जाएँ और मैं आप लोगों के पास आ जाऊँ ? फिर ना, सबकुछ सीखकर ही वापस आऊँगा…और हाँ दीदी को भी  घर के कामों के साथ साथ बाहर के काम भी सिखाइए…मजबूत बनाइए उन्हें भी ताकि वो घर और बाहर दोनों को अच्छे से मैनेज कर सके।
जल्द मिलेंगे इस उम्मीद के साथ।

आपका बेटा

मंजुला दूसी

 

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