आज की पत्नी

आज की पत्नी

 

 

मेरे पतिदेव भाई के लिए इंजीनियर लड़की का रिश्ता लेकर आए थे। घर में हर्ष का माहौल था। वह लड़की के बारे में मेरी माँ से बताते हुए कुछ ऐसे खो गए कि अपनी ही फिसलती वाणी का अंदाजा ना रहा। जिसके कारण अपनी मुसीबत बढा बैठे।  

 

 

 “इंजीनियर लड़की है। इसी जगह रिश्ते की हामी भर दीजिये। घर में दो तनख्वाह आए तो अच्छा है। वरना बीए-टीए पल्ले पड़़ जाएगी।”

 

 

“कहना क्या चाहते हो? बीए-एमए की डिग्री को कम आँकते हो? याद रखो! हर डिग्री का अपना महत्व है। मैैं अपनी शिक्षा पर सवाल नहीं सह सकती।” 

 

 

 ऐसा नहीं था कि मैं इंजीनियरिंग के खिलाफ़ थी पर अपनी डिग्री पर प्रश्नचिन्ह ने मुझे हिला दिया था। मेरा स्वाभिमान जाग चुका था। शादी के पाँच साल निकल गए थे। पति की बगैर सोचे समझे बोलने की आदत के कारण काफी परेशान थी। आज फिर उनके वक्तव्य ने दिल में आग लगा दिया था।

 

 

 

“दरअसल  कहना चाहता था कि आर्टस वाले भावुक होते हैं और हम इंजीनियर्स मशीनी,जो काम करने और पैसे कमाने में सिद्धहस्त होते हैं। भावनात्मक बातें सिर पर से गुजर जाती हैं।” उस वक़्त मन मसोसकर चुप रह गई थी। मैैंने भी मजा चखाने की ठान ली।

 

 

घर आकर उसी परिचर्चा को आगे बढाते हुए बोली,

“अच्छा जब तुम ऑनसाइट जाते हो और मैं तुम्हारे पीछे घर -परिवार का देखभाल करती हूँ तब तुम्हारे इंजीनियरिंग की या मेरी एम ए की डिग्री काम आती है?” 

 

 

“मैं तुम्हें नहीं कह रहा था। मेरा मतलब…..” 

 

 

“बहुत मतलबपरस्त हो। बस अपनी ही धुन में रहते हो। जैसे तुम्हारे सिवा किसी की कोई बिसात नहीं! बेटे की पढाई के साथ अपनी शिक्षिका की नौकरी संभाल रही हूँ। ससुराल व मायके की जिम्मेदारियों को भी बखूबी निभा रहीं हूँ!” मेरा क्रोध चरम पर था।

 

 “मानता हूँ इस बात को।”

 

 “इंजीनियर से शादी करते तो  तुम इतने ही निश्चिंत रह पाते जैसे अभी रहते हो।”

 

 “अरे! वो गलती से मुँह से निकल गया। समझा करो।”

 

 “ऐसे कैसे निकल गया।” 

 

“भूल जाओ उस बात को। चलो खाना खाते हैं।” 

 

“माफ करना। बीए- टीए से अब चाकरी की उम्मीद मत करना।”

 

 “पर्सनल क्यों ले रही हो? स्लिप ऑफ टंग समझ माफ करो और कुछ लजीज खिलाओ।” 

 

“आज खाना तो मिलने से रहा अब जाकर किसी इंजीनियर का दरवाजा खटखटाओ।”

 

 

मैं भी क्या करती? आज के जमाने की पत्नी हूँ।अपनी बेइज्जती कैसे सहती? एक बार सजा देना तो बनता ही था। रात के दस बजे घर का दरवाजा मुँह पर बंद कर दिया । हमेशा शेखी बघारने वाले पतिदेव दरवाज़े के बाहर खडे हाथ मल रहे थे। राजेश के कहने पर उसकी इंजीनियर बहन के रिश्ते की बात क्या चलाई, उनकी अपनी शादी ही खटाई में पड़ गई। अपनी धौंस जमाने में हमसफ़र को कमतर महसूस कराया। बराबरी के रिश्ते की कद्र नहीं की। अब आज की रात राजेश के घर जाकर खाने और सोने के सिवा कोई चारा शेष नहीं था।

 

आर्या झा

मौलिक व अप्रकाशित

Related posts

Leave a Comment