आखिरी रात

आखिरी रात

 

डॉक्टर साहब ,कितना समय है मेरे पास अभी … मृणालिनी थोड़ी शिथिलता के साथ पूछती है ,बेड पर लेटी हुई ,पहले जैसी सुंदर तो नहीं रही लेकिन उसकी आंखें जो श्रीकांत को बहुत अच्छी लगती थी आज भी वैसी ही है ।

डॉक्टर- मैं कैसे बता सकता हूं कितना समय है मृणालिनी ..

 

मृणालिनी हंसती हुई इतने बड़े डॉक्टर हो इतना भी नहीं बता सकते श्रीकांत.।

 

श्रीकांत -डॉक्टर हूं ,भगवान तो नहीं ।

 

मृणालिनी अपने आंसुओं को दबाती हुई छोटी सी मुस्कान के साथ पूछती है ,थक गए ना मेरा इलाज करते करते।

 

मैं तुम्हें बचपन में ही कहती थी मेरे पीछे मत पड़ो मुझसे शादी करोगे ,बहुत तंग करूंगी … अब लो झेलो तब तो माने नहीं थे ।

 

श्रीकांत -क्या करूं तुम थी ही इतनी सुंदर ,इतनी अच्छी मुझे लगा था शॉपिंग करोगी , घूमने जाओगी और तुम्हारी छोटी-छोटी ख्वाहिश, इतना तो मैं कमा ही लूंगा कि तुम्हारी सारी ख्वाहिश पूरी कर दूंगा…झेल लूंगा तुम्हें मृणालिनी ….

 

मृणालिनी -लेकिन अब तो मैं तुम्हें मैं बहुत ज्यादा तंग कर रही हूं श्रीकांत।

 

श्रीकांत ,हंसते हुए तंग होने की कसम जो खाई थी तुम्हारे साथ, अब निभानी तो पड़ेगी ही , तुम्हें याद है जब हम पहली बार मिले थे कितनी छोटी थी तुम ,…..

हां तुम तो बहुत बड़े थे ना श्रीकांत मुस्कुराते हुए मृणालिनी बोली.।

 

श्रीकांत मुस्कुराते हुए तुमसे तो बड़ा ही था और तुम्हें याद है तुम्हारे मामा

के बेटे ने मेरी पिटाई की थी। मृणालिनी हंसते हुए वो तो चेक कर रहे थे कि तुम्हारी हड्डियों में कितना दम है मेरा बोझ उठा पाओगे या नहीं…

 

श्रीकांत और मृणालिनी दोनों ठहाके लगाते हैं लेकिन कुछ देर बाद कमरे में सन्नाटा पसर जाता है।

श्रीकांत – कितना बोलती हो तुम ,चुप होने का नाम ही नहीं लेती । हमेशा जल्दी में रहती हो पढ़ाई छोड़ने की जल्दी, शादी की जल्दी ,बच्चों की जल्दी और अब बोलते बोलते श्रीकांत चुप हो गया ,,चेहरे पर उदासी सी आ गई ।

मृणालिनी हंसते हुए हुए क्या करूं भगवान ने समय ही कम दिया था, काम सारे करने थे । बातों का स्टॉक भी तो खत्म करना था ।

श्रीकांत -तुम्हें हमेशा मजाक सूझता है। इतने दर्द में इतना कैसे हंस लेती हो ।

 

श्रीकांत बाबू आदत है बचपन की हंसते हुए मृणालिनी बोली बचपन में मां बाप नहीं थे मामा मामी ने पाला, आदत सी पड़ गई थी परेशानियों में हंसने की ।

श्रीकांत -दवा ली

मृणालिनी -नहीं भूल गई

श्रीकांत -शुरू से लापरवाह हो

मृणालिनी हंसती हुई डॉक्टर साहब आप थे ना परवाह करने के लिए इसलिए लापरवाह हो गए ।

 

चलो अब सो जाओ 11:00 बज गए हैं मुझे भी नींद आ रही है तुम्हारी बातें तो वैसे भी खत्म नहीं होने वाली।

श्रीकांत कुछ देर बाद ही मृणालिनी को जगाता है सो गई क्या ।

 

तुम ही तो कह कर गए थे सो जाओ फिर जगाने आ गए मृणालिनी थोड़ा गुस्सा के बोलती है ।

श्रीकांत – अच्छा सो जाओ ,नहीं तो फिर से तुम्हारा रेडियो ऑन हो जाएगा।

मृणालिनी हंसते हुए थोड़ा हंसा करो, अच्छे लगते हो श्रीकांत।

श्रीकांत -मै वैसे भी अच्छा लगता हूं कॉलेज की सब लड़कियां मरती थी मुझ पर ।

मृणालिनी- पता है एक-एक के बारे में, तुम्हारी प्यारी शीतल कहां है।

 

मुझे क्या पता श्रीकांत गुस्से में बोलता है।

क्यों क्यों तुम्हें तो बहुत अच्छे लगती थी ।

श्रीकांत- तुम से पहले और तुम्हारे बाद मुझे कोई लड़की कभी अच्छी नहीं लगी शीतल सिर्फ मेरी दोस्त थी। मृणालिनी मुंह बनाती हुई और मन ही मन अपने किस्मत पर इतराती हुई।

 

अच्छा चलो सो जाओ रात के 2:00 बज रहे हैं।

 

थोड़ी देर बाद श्रीकांत फिर से मृणालिनी को झकझोरता है, सो गई क्या …

नहीं बाबा बोलो क्या बोलना है मृणालिनी गुस्से में..

कुछ नहीं मुझे लगा सो नहीं रही हो इसलिए पूछने चला आया था ।

 

मृणालिनी -श्रीकांत एक बात कहूं, क्या मैं थोड़ा और नहीं जी सकती, क्या तुम मुझे बचा नहीं सकते हो, क्योंकि मैं तुम्हें और तंग करना चाहती हूं ।

निशब्द होकर मृणालिनी की तरफ एकटक देखता चला जा रहा है श्रीकांत!

मेरी भी आदत पड़ गई है, तुमसे तंग होने की ।

 

दुखी होकर मृणालिनी दूसरी तरफ करवट होकर लेट जाती है ।

श्रीकांत -अब सो जाओ मृणालिनी बहुत रात हो गई है सुबह के 4:00 बजने वाले हैं ।

बहुत बातें करती हो तुम।

 

कब दोनों को नींद लग गई पता ही नहीं चला सुबह के 8:00 बज गए एकाएक श्रीकांत की नींद खुली, मृणालिनी के बेड के पास ही कुर्सी लगाकर सो गया था। मृणालिनी के हाथ उसके हाथों में थे।

उठो मृणालिनी तुम्हारी दवा का समय हो गया, बहुत देर हो गई दवा में ।

 

मृणालिनी कुछ बोल ही नहीं रही है कई बार श्रीकांत ने झकझोरा …उठो उठो मृणालिनी, कुछ बोलो ,

मृणालिनी की वही सुंदर आंखें लेकिन खुल नहीं रही थी !

श्रीकांत एकटक उसे देखता रह गया आवाक ,निशब्द…..

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