अपनी नाव

बिटिया कागज़ की नाव बनाना सीख गई थी, रोज़ रंग-बिरंगी नाव बनाती और बेसब्री से बरसात का इंतज़ार करती । काले-काले मेघ आते पर निष्ठुर बरसे बिना ही चले जाते और बिटिया उदास हो उठती । मैंने उसको एक रास्ता सुझाया कि वह टब में पानी भर कर उसमें अपनी नाव चलाये परन्तु अपने पिता की ही तरह उसके ख्वाब और चाहतें बड़ीं थीं फिर भला सुविधापूर्वक उपलब्ध होने वाली खुशियों की कीमत कैसे समझते दोनों ?

 

शाम ढल आई थी, आसमान काले घने बादलों से भरा हुआ था, बिटिया की नजर आसमान पर टिकी हुई थी । एक बूँद उसके हाथों पर आ गिरी और वो ख़ुशी से उछलने लगी “बारिश आ गई, बारिश आ गई”  और दौड़ती हुई अपने पिताजी से सड़क पर जाने की जिद्द करने लगी ।

 

 

 

“बिटिया, बाहर बहुत अँधेरा है और रात भी हो गई है, बूंदा-बांदी में नाव नहीं चलेगी” हँसते हुये जब राज ने बिटिया को टालने की कोशिश करी तो वह इतने जोर से रोने लगी मानों बरसों से संजोया उसका सपना चकनाचूर हो गया हो । मैंने उसकी बनाई कागज़ की नाव टब में चलाते हुए उसे आवाज़ लगाई, वह सुबकते हुए मेरे पास आई और एक बार फिर उसकी आँखों में ख़ुशी की चमक फ़ैल गई  ।

 

 

 

“ओ माय गॉड ! मम्मा मेरी नाव कितनी अच्छी चल रही है” अपने छोटे से गोल-मटोल चेहरे को अपने हाथों में हैरानी से दबाए वह पापा को भी बुला लाई । 

 

“पापा ! मेरी नाव डूबेगी तो नहीं ? पानी पर ऊँगली को नाव के आस-पास घुमाती हुई वह तैरती नाव को देख बोली  ।

 

“नहीं बिटिया, कम से कम ..इस टब में तो नहीं डूबेगी” ।

 

“क्या मतलब पापा?”

 

“बिटिया, अगर सड़क पर बहते पानी में चलाओगी तो तुम्हारी यह नाव गल भी जायेगी और डूब भी जायेगी”।

 

 

 

“तो क्या मेरी नाव कभी भी बरसात के पानी में नहीं चल सकती?”

 

“चलेगी..जरुर चलेगी, पर हम तुम्हारी बनाई नाव नहीं मेरी बनाई नाव चलायेंगे” ।

 

 

“तो क्या, आपकी नाव नहीं डूबेगी फिर? कैसी नाव बनाओगे पापा?” बिटिया ने आँखें चौड़ी करते हुए पूछा ।

 

 

“हम लकड़ी से बड़ी सी मोटर वाली नाव बनायेंगे और वो सर्रर्र से दौड़ेगी, न गलेगी न डूबेगी”।

 

 

मैं राज की बातों से सहमत नहीं थी परन्तु उनके सामने बोलना मतलब आग बरसाते तूफ़ान को निमन्त्रण देना था । उनकी बात को काटने का साहस नहीं था मुझमें । मैं चाहती थी कि मेरी बिटिया स्वावलंबी बने, महत्वाकांक्षी नहीं , उसे अपने हर निर्णय पर भरोसा हो ।  

 

 

अगले दिन रविवार की छुट्टी थी तो राज ने देर रात जाग कर मोटर वाली नाव बना दी और सुबह-सुबह ही बिटिया को तोहफे के रूप उसे भेंट कर दिया । आज बरसात भी अपने पूरे रंग पर थी, देर रात से ही घनघोर बारिश हो रही थी, घर के सामने ही आँगन में पानी ही पानी बह रहा था । बिटिया की ख़ुशी देखते ही बन रही थी, आखिर बरसात के पानी में नाव चलाने की उसकी मन्नत जो पूरी होने वाली थी ।

 

 

सुहावना मौसम, ठंडी हवा और दिन भी शाम सा प्रतीत हो रहा था, ऐसे मौसम में तो सबका दिल एक अलग ही उमंग से भर जाता है । मुझे भी अपने बचपन के दिन याद आ रहे थे, हम दोनों भाई-बहन भी बारिश में खूब भीगते और नाव चलाते थे, माँ गरमा-गर्म पकोड़े बनाती और हम जी भरकर खाते थे ।

 

“मम्मा ! आप क्या बना रहे हो कागज़ से ?” जितने भोलेपन से बिटिया ने पूछा उतने ही प्यार से मैंने भी जवाब दिया “अपनी नाव” ।

 

 

“तो क्या आप मोटर वाली नाव से रेस लगाओगे? बड़ा मज़ा आयेगा” । बिटिया की बातें सुन राज जोर से ठहाका लगाते हुए बोले “हहह ! मम्मा की हार तो पक्की है अब ” ।

 

 

“कितनी आसानी से बिटिया के सामने माँ को हारा हुआ कह दिया इन्होने, बस ऐसी ही बातें बच्चों के मन में बैठ जाती हैं कि माँ को कुछ आता  ही नहीं, वह मंद्बुधि हैं और पिता बुद्धिमान।  बच्चे समझ ही नहीं पाते कि माँ और पिता के प्रयास, मेहनत और बुधि का स्तर एक समान ही होता है” मैं अपने ख्यालों में खोई हुई थी कि बिजली की गर्जना ने मेरी तंद्रा भंग करी ।

 

तेज़ बरसात हो रही थी, राज छाता लिये बिटिया के साथ मोटर वाली नाव की चाबी घुमा रहे थे और मैंने बरखा की ठंडी बूंदों का आनंद लेते हुए, अपनी कागज़ की नाव को बहते पानी में छोड़ दिया, पानी के प्रवाह के साथ वह तेज़ी से आगे बढ़ी और बाप-बेटी की नाव के पास जा पहुँची ।  मेरी नाव देखकर बिटिया जोर से हँसी और उसके हँसते बचपन को देख मेरा मन मयूर सा नाच उठा । 

 

“हमारी नाव अब चलने को तैयार है” कहते हुए राज ने नाव को पानी में छोड़ दिया । उनकी नाव तेज़ी से आगे बढ़ रही थी और मेरी नाव पानी में हिचकोले खा रही थी । अब राज ठहरे इंजिनियर और मैं वकील । उनका टेक्निकल ज्ञान तो जीतना ही था परन्तु हार-जीत की वकालत करने के लिए मेरा मन ही नहीं मानता था ।

 

बिटिया जोर से ताली बजा रही थी, राज उसे छाते से बाहर नहीं आ दे रहे थे क्यूंकि उनको लगता  था कि भीगने से बिटिया बीमार हो जाएगी । मैं चाहती थी कि वह अपने बचपन की इस बरसात का पूर्णतया लुत्फ़ उठा सके, बिल्कुल वैसे ही जैसे मैं बचपन में उठाया करती थी पर डरती भी थी कि अगर बिटिया बीमार हुई तो राज के ताने रोज़ सुनने पड़ेंगे ।आखिर कागज़ की नाव सी ही जिन्दगी तो होती है हम औरतों की,  पानी को ऊँगली से घुमाओ तो गोल घूमेगी, आगे को धक्का मारो तो आगे बढ़ेगी अन्यथा एक ही जगह पर हिलती-डुलती रहेगी, पानी में गल कर उसमें समा जाएगी या बेकार होने पर फाड़ कर नई बना ली जाएगी और एक बार फिर दामिनी गरजती हुई मुझे ख्यालों की दुनिया से बाहर ले आई ।

 

मेरी कागज़ की कश्ती को राज की मोटर वाली कश्ती पीछे छोड़ चुकी थी परन्तु राज की कश्ती कुछ दूर जाकर रुक गयी थी । राज ने ध्यान से देखा तो मोटर काम नही कर रही थी, वह उसे ठीक करने के लिए घर के अंदर ले गये । बिटिया उदास होने लगी थी, अगर बरसात रुक गयी तो वह नाव नहीं चला पाएगी । मैंने कहा “बिटिया, जब तक पापा अपनी नाव ठीक कर लाते हैं , तब तक तुम कागज़ से अपनी नाव बनाओ “।

 

वह फटाफट अपनी नाव बनाकर ले आई । मेरी नाव और उसकी नाव दोनों ही पानी के प्रवाह के साथ एक साथ बह रहे थे , बारिश में भीगने में उसे भी बड़ा मज़ा आ रहा था । मैंने उसको एक नया आईडिया सुझाया और उसने मेरे सुझाव अनुसार रंग-बिरंगी तीन-चार नाव बनाईं  । 

 

थोड़ी ही देर में राज मुंह लटकाए आँगन में आये और बोले “बिटिया, शायद मोटर में कुछ खराबी आ गयी है, जल्दी ठीक नहीं हो पायेगी” ।

 

“नो प्रॉब्लम पापा ! देखो हमारी नाव की रेल” एक नाव के साथ दूसरी नाव बांध कर हम दोनों ने एक रेल बना दी थी, जो पानी पर बड़ी सरलता से आगे की ओर बढती जा रही थी ।

 

“वाओ ! ये तो जबरदस्त आईडिया है” कहते हुए राज भी भीगते हुए बिटिया के साथ रंग-बिरंगी नाव की रेल देखने लगे ।

 

 

“पता है पापा, ये आईडिया तो मम्मा का था , मैंने कागज़ से नाव बनाई और मम्मा ने उनको बाँध दिया” बिटिया उछलती हुई बोली !

 

“अच्छा, तो ये नाव तुम्हारी हैं?” राज के पूछते ही बिटिया बड़े गर्व से बोली “हाँ पापा, ये मेरी अपनी नाव हैं, मैं आज बहुत खुश हूँ”  और मैं आगे बढ़ती नाव के साथ उसकी अपनी रचनात्मकता से रचे हुये आत्मविश्वास को बढ़ते और खुशियों की कीमत समझते हुए देख रही थी । 

 

 

 

धन्यवाद !

 

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