अतिथिः असुरोंःभव्ः

 ।।।अतिथिः असुरोंः भवः।।।

 

 सुबह-सुबह फोन की घंटी बजी।

 हेलो!  प्रणाम बड़े भैया! 

  कौन बोल रहा है?

 “अरे ! हम बोल रहे हैं ,आपके प्यारे राम जी अंकल के छोटे बेटे विपिन। हम दिल्ली आ रहे थे ,सोचा आप से मिल लें। “

 हमें ध्यान आया  के पापा के ऑफिस में राम जी अंकल काम करते थे पर अब तो पापा रहे नहीं ।

“चलो ठीक है, आ जाओ ,बैठ कर बातें करेंगे ।”

   श्रीमती जी ने पूछा? “आप इनको जानते हैं” मैंने कहा! “बहुत अच्छी तरह नहीं, हां ! लेकिन कुछ जान पहचान है ।”

सुबह-सुबह डोर बेल बजी ।हमारी धर्मपत्नी जी ने दरवाजा खोला। नमस्ते भैया ! थोड़ी देर बाद हमने मिडिल  लोअर क्लास फेमिली  का फेवरेट नाश्ता हलवा और पकोड़े किया।   बहुत सारी बातचीत हुई, और हम ऑफिस और  विपिन भाई आराम।

   शाम को हम विपिन भैया को सिनेमा दिखाने के लिए गए। और रेस्तरां में खाना भी खिलाया।  मन ही मन सोच रहे थे कल तो यह चला जाएगा, तो खातिरदारी में कमी नहीं होनी चाहिए। अतिथिः देवोः भवः की परंपरा को कायम रखने के लिए हमने बाहें पसार के स्वागत किया।

   अगले दिन विपिन– भैया! आज शाम को दिल्ली का लाल किला और कुतुब मीनार देखने चलेंगे।

   हमारी श्रीमती जी से आश्चर्य भरी नजरों से हमारी तरफ देखा,, जैसे पूछ रही है *कि जा नहीं रहे??

  खैर पराँठा का नाश्ता हुआ। हमने कहा ठीक है, शाम को घूमने चलते हैं ।

 दोपहर के भोजन में हमारी श्रीमती जी ने दो सब्जियां बनाई फूले फूले फुलके बनाए ,और अपना मुहंँ भी फुला रखा था। 

   शाम को हम घूमने निकले । हमारा बजट बिगड़ चुका था ।हमने अपने बटुए को बचाते हुए बात संभालते हुए कहा, कि यहां रेहडी के छोले कुलचे हमारी श्रीमती जी को बहुत पसंद है चलो सब वही खाते हैं । लेकिन विपिन भाई की गोलगप्पे की और पावभाजी की फरमाइश को हम मना नहीं कर पाए। आते-आते जलेबियों की थैली भी साथ में थी।

 रात्रि में  शयनकक्ष में श्रीमती जी ने साफ कह दिया  कि कल ये चले जाना चाहिए।    नहीं तो ………….।

 (जान ना पहचान मैं तेरा मेहमान) हम सोच रहे थे कि सुबह अपना बोरिया बिस्तर लेकर ये जाएंगे और हम रुकने  के लिए कहेंगें पर ये अच्छे मेहमान की तरह टाटा करके चले जाएंगे ।

लेकिन सुबह फिर…

 भैया! और कौन -कौन से दर्शनीय स्थल हैं यहां पर?

  मन मैं आया कि कह दे कि,,,,

    “यहां पर एक भी दर्शनीय स्थल नहीं बचा । अचानक सारे धराशाई हो गए हैं   पूरा दिल्ली सुनसान पड़ा है। मुगल अपनी इमारतें उठाकर ले गए हैं। भैया तुम भी यहां से उठ लो।

  लेकिन हमने शाम को काम का बहाना बनाया और रात को      देर से घर आने को कह कर निकल दि। 

 भैया! शाम को गुलाबजामुन लेते आना।

 हमारी श्रीमती जी ने हमें  जोर से घूर के देखा, हम चुपचाप चले गए।

 दोपहर को एक सब्जी बनाई और खाना दे दिया। शाम को चाय भी वह भी बिना बिस्किट, नमकीन के। 

 

 भाभी जी! थोड़े पकोड़े बन जाते? 

 बेसन खत्म हो गया है भैया और बिस्किट नमकीन भी।

 

  3 दिन में सोफा भी कराह उठा ।हमरी मालकिन बचाओ, पतला हो गया हूं।

 शाम को हम घर आए ।भाई साहब मजे से टीवी देख रहे थे। हमारी देवी जी कुढ़- कुढ़ कर आधी हुई जाती थी।

 

  हमारे सौहार्द बोरियत में बदल चुका था। आतिथ्य भाव की सारी गर्मी खत्म हो चुकी थी। गर्मी अब हमारे अंदर बढ़ गई थी। हम कहने वाले थे भाई उठ!  अब तुम्हारा भी अपना एक स्वीट होम है, अपने घर जाओ, हमारे घर में बिटरनैस फैलाने वाले    हे प्राणी!  मैं तुम्हें श्राप ना दे दूं ।अब तुम चले जाओ। अब तुम्हारे-हमारे रिश्ते से दुखबू  आ रही है। दोस्त ,,,

 

हम तो अभी भी अतिथिः देवोः भवः की परंपरा का पालन कर रहे हैं । लेकिन अतिथि हमेशा देवता नहीं होता। कभी कभी मनुष्य या थोडा  असुर प्रवृत्ति हो सकता है।

 

 तभी हमारे दोनों बच्चे दौड़ते- दौड़ते आए। मम्मी- मम्मी  जो हमारे यहां पर चाचू आए हैं, अपने कपड़े निकाल कर रहे हैं। शायद कल जाएंगे, हम दोनों दंपत्ति खुशी के मारे भैया के कमरे में गये।

 क्या कर रहे हो  विपिन!  अभी इतनी  रात में ही जा रहे हो क्या?

 बोले नही!  यह तो गंदे कपड़े धोने के लिए लॉन्ड्री में देने हैं। कहां है लॉन्ड्री? कल दे देना भाभी ज!  मैं तो अभी दो-तीन दिन रहूंगा,,,,,,,,  

 

।।। स्वरचित 

हीतू सिंगला।।। 

Related posts

Leave a Comment